२२०० वर्ष पुराने पुरातात्विक स्थल किच्चकबध में नौवें चरण का उत्खनन संपन्न, संरक्षण के लिए करोड़ का बजट आवश्यक

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भद्रपुर(​नेत्र विक्रम बिमली): ​दक्षिणी झापा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व से समृद्ध महाभारत कालीन स्थल किच्चकबध में नौवें चरण का उत्खनन और अनुसंधान कार्य संपन्न हो गया है। भद्रपुर नगरपालिका-३ स्थित देउनिया और मेची नदी के तट पर अवस्थित १० बीघा क्षेत्र में फैले, तथा इस क्षेत्र के प्रमुख पर्यटन एवं धार्मिक-आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित हो रहे किच्चकबध स्थल पर ही आज एक विशेष संवाददाता सम्मेलन (प्रेस कॉन्फ्रेंस) का आयोजन कर उत्खनन की अद्यतन स्थिति और प्रगति के बारे में जानकारी दी गई।
​संवाददाता सम्मेलन में भद्रपुर नगरपालिका के प्रमुख (मेयर) गणेश पोखरेल, पुरातत्वविद् उद्धव आचार्य, मेची बहुमुखी परिसर के पूर्व प्रमुख चिंतामणि दाहाल सहित अन्य वक्ताओं ने किच्चकबध के ऐतिहासिक महत्त्व, चुनौतियों और इसकी भावी महायोजना (मास्टर प्लान) पर चर्चा की।
​ज्येष्ठ 8 से ३० तारीख तक १६ सदस्यीय दल द्वारा उत्खनन
​पुरातत्व अधिकारी नवराज अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस वर्ष का नौवां चरण का उत्खनन कार्य ज्येष्ठ 8 गते से शुरू होकर ज्येष्ठ 30 गते तक संचालित किया गया था। इस उत्खनन कार्य का मुख्य नेतृत्व वरिष्ठ पुरातत्वविद् उद्धव आचार्य ने किया। इसमें पुरातत्व अधिकारी नवराज अधिकारी, छायाकार (फोटोग्राफर) राम श्रेष्ठ सहित तकनीकी विशेषज्ञों और श्रमिकों को मिलाकर दैनिक रूप से १६ लोगों की टीम ने निरंतर उत्खनन और अनुसंधान का कार्य किया।
​नगर प्रमुख पोखरेल का आक्रोश: बजट कटौती से समस्या, संपदा सूची में शामिल करने के लिए चर्चा तेज
​पर्यटन और धार्मिक दृष्टिकोण से प्रचुर संभावनाओं से भरे किच्चकबध स्थल पर ही आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए भद्रपुर नगरपालिका के प्रमुख गणेश पोखरेल ने सरकार की उदासीनता पर गहरी चिंता व्यक्त की। नगर प्रमुख पोखरेल ने उल्लेख किया कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे न्यूनतम बजट में भी कटौती कर देने के कारण इस ऐतिहासिक क्षेत्र का उत्खनन और संरक्षण करना अत्यंत कठिन हो रहा है।
​इसके बावजूद, स्थानीय सरकार इसके विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने जानकारी दी कि कोशी प्रदेश सरकार से आवश्यक बजट प्राप्त करने के लिए विशेष पहल की जा रही है। प्रदेश सरकार से बजट मिलते ही उत्खनन के शेष कार्य को तीव्रता से पूरा किया जाएगा। साथ ही, इस क्षेत्र को नेपाल की प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन संपदा सूची में शामिल कराने के लिए सरोकारवालों और विशेषज्ञों के साथ निरंतर विचार-विमर्श चल रहा है।
​नौवें चरण का उत्खनन: प्राचीन ‘शौचालय’ भी मिला
​वि.सं. २०५८ से निरंतर उत्खनन का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ पुरातत्वविद् उद्धव आचार्य के अनुसार, इस बार के नौवें चरण के उत्खनन के दौरान कई नए और रोचक ऐतिहासिक तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने खुलासा किया कि इस चरण में प्राचीन महल की संरचना के भीतर एक ‘शौचालय’ के अवशेष भी मिले हैं।
​पुरातत्वविद् आचार्य ने कहा, “अब तक मिली पुरातात्विक सामग्रियां २२०० वर्ष पुरानी उन्नत मानव सभ्यता और वास्तुकला को प्रमाणित कर चुकी हैं। हालांकि, यह क्षेत्र अत्यंत विशाल है, इसलिए पूर्ण उत्खनन समाप्त होने के बाद ही इसके विस्तृत स्वरूप और समग्र इतिहास का अंतिम विवरण दिया जा सकता है।”
​सातवें से नौवें चरण तक की उपलब्धियां
​विगत के उत्खननों में यहाँ उत्तर-पूर्व में एक विशाल बहुमंजिला भवन, उसके कुछ दक्षिण में एक अन्य भवन, उत्तर-पश्चिम में संतरी (सुरक्षा पोस्ट) कक्ष और दक्षिण की ओर सुरक्षा प्रमुख के आवास सहित कुल ५ भवनों की संरचनाएं मिल चुकी हैं।
​हालिया चरणों में, मानव-निर्मित मंदिरों को हटाए गए स्थानों पर तीन मीटर से अधिक गहरा प्राचीन ‘महल की नींव’ और पुरानी ईंटें मिली हैं। इससे पूर्व मिले भाले, बाण, मिट्टी के बर्तन और घोड़ों-हाथियों के साजो-सामान का ब्रिटेन में ‘कार्बन डेटिंग’ (वैज्ञानिक परीक्षण) कराने पर इस सभ्यता के ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी (२२०० वर्ष पुरानी) के होने की पुष्टि हो चुकी है। पुरातत्वविद् आचार्य ने बताया कि यह वह समय था जब भारत में शुंग-कुषाण काल और गुप्त काल का प्रभाव था, और बाद में प्राकृतिक आपदा के कारण यह स्थल नष्ट हो गया होगा, जैसा कि फ्रांसीसी भूवैज्ञानिकों के अध्ययन में भी दर्शाया गया है।
​सीमित बजट मुख्य चुनौती: एक करोड़ रुपये हों तो ३ महीने में काम पूरा
​सरकार द्वारा इस पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण और उत्खनन के लिए पर्याप्त निवेश न किए जाने के कारण हर वर्ष काम अधूरा रह जाता है। पुरातत्व विभाग के प्रतिनिधियों ने बताया कि इस वर्ष विभाग ने केवल १० लाख रुपये का बजट आवंटित कर दैनिक रूप से संरक्षण का कार्य किया है।
​प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी गई कि अल्प बजट से उत्खनन करने पर कई वर्ष लग जाएंगे, जिससे पुरातात्विक सामग्रियों के नष्ट होने का जोखिम बढ़ जाता है। यदि सरकार या संबंधित निकाय लगभग १ से डेढ़ करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध करा दें, तो लगातार ३-४ महीने पर्याप्त जनशक्ति लगाकर पूरे उत्खनन का कार्य एक ही बार में संपन्न किया जा सकता है।
​मानव-निर्मित संरचनाएं और आवाजाही से जोखिम
​किच्चकबध क्षेत्र में हाल के दिनों में मनमाने ढंग से बनाए गए नए मंदिरों, तालाबों और अन्य भौतिक संरचनाओं के कारण ऐतिहासिक अवशेषों के नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। विभाग को आशंका है कि पूर्व में इस क्षेत्र में जुताई और खेती किए जाने के कारण भी भू-सतह की कई मूल्यवान सामग्रियां नष्ट हो चुकी हैं।
​पुरातत्वविद् आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि उत्खनित और संरक्षित क्षेत्रों में लोगों के चलने-फिरने से प्राचीन संरचनाएं ढह जाती हैं, इसलिए वहाँ आवाजाही पर रोक लगनी चाहिए और स्थानीय संरक्षण समिति को इसे सुरक्षित रखने में विशेष भूमिका निभानी चाहिए।

​किंवदंती और ऐतिहासिकता
​पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में राजा विराट के साले ‘किच्चक’ का महल यहीं स्थित था। पांच पांडवों के अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी पर कुदृष्टि डालने के कारण भीमसेन ने विराटनगर से खदेड़कर किच्चक का इसी स्थान पर वध किया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘किच्चकबध’ पड़ा। हालांकि यहाँ कोई लिखित दस्तावेज नहीं मिला है, लेकिन अब तक प्राप्त वास्तुकला और संरचनाएं इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि यह एक ऐतिहासिक किला और महल था।

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