काठमांडू: नेपाल सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए एक उच्चस्तरीय संपत्ति जांच आयोग को व्यापक अधिकार दिए हैं। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र कुमार भंडारी की अध्यक्षता में इस ५ सदस्यीय आयोग का गठन किया है, जिसे विक्रम संवत २०४८ (वर्ष १९९१) से अब तक के सार्वजनिक पदों पर रहे व्यक्तियों की संपत्ति की जांच करने का जिम्मा सौंपा गया है।
कौन-कौन आएंगे जांच के दायरे में?
आयोग के क्षेत्राधिकार में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के सभी उच्चपदस्थ अधिकारी शामिल हैं। इसमें १९९१ के बाद रहे पूर्व प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद और संवैधानिक निकायों के प्रमुख शामिल हैं। साथ ही, नेपाली सेना के सेवानिवृत्त उच्च अधिकारी (राजपत्रित प्रथम श्रेणी और उससे ऊपर), नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के शीर्ष अधिकारियों की संपत्ति की भी बारीकी से जांच की जाएगी।
इसके अलावा, नेपाल राष्ट्र बैंक के गवर्नर, सरकारी बैंकों के संचालक, विश्वविद्यालयों के पदाधिकारी, सार्वजनिक संस्थानों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के सलाहकार व निजी सचिव भी जांच के दायरे में रखे गए हैं। आयोग को न केवल देश के भीतर, बल्कि विदेशों में छिपाई गई संदिग्ध संपत्ति की जांच के लिए इंटरपोल और राजनयिक मिशनों के साथ समन्वय करने का अधिकार भी दिया गया है।
जांच की प्रक्रिया और प्राथमिकता
आयोग का कार्य दो चरणों में पूरा होगा। पहले चरण में वर्ष २००५/०६ से २०२६ मार्च के अंत तक के पदाधिकारियों की संपत्ति का विवरण जुटाया जाएगा। दूसरे चरण में वर्ष १९९१ से २००५ तक के उच्चाधिकारियों की जांच होगी। विशेष रूप से उन कर्मचारियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जिनकी आर्थिक स्थिति अस्वाभाविक रूप से ऊंची है या जिन्होंने राजस्व और भूमि प्रशासन जैसे संवेदनशील विभागों में लंबे समय तक काम किया है। आयोग को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत और सार्वजनिक मर्यादा को ठेस न पहुंचे और पूरी प्रक्रिया गोपनीय रहे।









