समुद्रगुप्त ‘भारत के नेपोलियन’ जिनके शासनकाल में सिर्फ़ सोने के सिक्के चलते थे

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नई दिल्ली: गुप्त वंश के महान सम्राट समुद्रगुप्त को इतिहासकारों ने ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है। उनकी असाधारण सैन्य प्रतिभा, कुशल शासन, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक समृद्धि के कारण उन्हें भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग का प्रतिनिधि शासक माना जाता है।
चंद्रगुप्त प्रथम ने वृद्धावस्था में शासन की ज़िम्मेदारी अपने पुत्र समुद्रगुप्त को सौंपी थी। वह सबसे बड़े पुत्र नहीं थे, लेकिन निष्ठा, न्यायप्रियता और वीरता के कारण उन्होंने स्वयं को एक योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध किया। इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख में उनके उत्तराधिकारी बनने का भावनात्मक वर्णन मिलता है।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि समुद्रगुप्त को सत्ता प्राप्त करने के लिए अन्य दावेदारों से संघर्ष करना पड़ा था। इनमें काच नाम प्रमुख है, जिसके नाम के सोने के सिक्के मिलने के प्रमाण हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार काच और भष्म एक ही व्यक्ति थे।
समुद्रगुप्त बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वह महान योद्धा होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक, कवि और संगीतप्रेमी भी थे। काव्य और संगीत में दक्षता के कारण उन्हें ‘कविराज’ की उपाधि दी गई थी। उनके कई सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है। उनके दरबार में हरिषेण और वासुबंधु जैसे विद्वान मौजूद थे।
इलाहाबाद शिलालेख के अनुसार समुद्रगुप्त ने सैकड़ों युद्ध लड़े और कभी पराजित नहीं हुए। उन्होंने उत्तर भारत के नौ राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाया, जबकि दक्षिण भारत में जीते गए राज्यों को अधीनस्थ बनाकर उनके शासकों को पुनः सत्ता सौंप दी। इसे उनकी दूरदर्शी राजनीतिक नीति माना जाता है।
उनके शासनकाल में पाटलिपुत्र ने फिर से वैभव प्राप्त किया। गंगा घाटी का अधिकांश भाग, बंगाल, असम और नेपाल तक उनका प्रभाव फैल गया था। श्रीलंका सहित कई विदेशी राज्यों से उनके कूटनीतिक संबंध थे।
धार्मिक रूप से वह विष्णु भक्त थे, लेकिन धार्मिक सहिष्णुता के समर्थक भी थे। श्रीलंका के राजा के अनुरोध पर बोधगया में बौद्ध मठ निर्माण की अनुमति देना इसका उदाहरण है।
आर्थिक दृष्टि से समुद्रगुप्त का शासन अत्यंत समृद्ध था। उनके समय में केवल सोने के सिक्कों का प्रचलन था। इतिहासकार राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार उन्होंने आठ प्रकार के स्वर्ण सिक्के जारी किए, जिनके लिए सोना युद्ध अभियानों से प्राप्त हुआ था।
इतिहासकार एच.सी. रायचौधरी ने सम्राट अशोक और समुद्रगुप्त की तुलना करते हुए लिखा है कि जहां अशोक शांति और अहिंसा के पक्षधर थे, वहीं समुद्रगुप्त युद्ध, विजय और आर्थिक सुदृढ़ता में विश्वास रखते थे।
लगभग ४५ वर्षों तक शासन करने के बाद सन् ३८० के आसपास समुद्रगुप्त का निधन हुआ। सैन्य कौशल, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक समृद्धि के कारण उन्हें भारतीय इतिहास के सर्वकालीन महान सम्राटों में गिना जाता है।

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