विवाह पूर्व आपसी सहमति से बना शारीरिक संबंध चरित्र पर दाग नहीं: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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​नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध को किसी भी व्यक्ति के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। बदलते समय और विवाह से पहले शारीरिक संबंध के बढ़ते चलन का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अविवाहित बालिगों के मध्य आपसी सहमति से बने संबंधों को ‘नैतिक अधमता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जिसके आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में कोई नकारात्मक निष्कर्ष निकाला जाए। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय उस मामले में सुनाया, जिसमें तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने एक उम्मीदवार की नियुक्ति को महज इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि उसका नाम एक पुराने और असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले में आया था।
​उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी संबंध को गलत या अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह विवाह की परिणति तक नहीं पहुंच पाया। अदालत ने कहा कि हर रिश्ता शादी में ही बदले, यह आवश्यक नहीं है और रिश्ता टूटने पर किसी एक पक्ष को धोखेबाज नहीं माना जा सकता। देश में ऐसा कोई कानून विद्यमान नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को आपसी सहमति से अपनी पसंद का संबंध रखने से वंचित करता हो। इस मामले में अपीलकर्ता और शिकायतकर्ता पड़ोसी थे तथा विगत चार वर्षों से उनके बीच प्रेम संबंध था। न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब तक किसी आरोप को अदालत में सिद्ध नहीं कर दिया जाता, तब तक उस व्यक्ति को पूर्ण रूप से निर्दोष माना जाएगा।
​अदालत ने विवाह का वादा करके दुष्कर्म के मामलों पर भी गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसे किसी मामले में लोक अदालत के माध्यम से समझौता हुआ है, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने नियोक्ताओं को सचेत करते हुए कहा कि कोई भी एम्प्लॉयर सिर्फ इसलिए उम्मीदवार के विरुद्ध कोई प्रतिकूल राय नहीं बना सकता कि कोई क्रिमिनल केस समझौते के साथ समाप्त हुआ है, जब तक कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत न हो कि शिकायतकर्ता पर समझौता करने के लिए कोई अनुचित दबाव या बल प्रयोग किया गया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि लंबे समय तक चलने वाले ऐसे संबंधों में वैध सहमति की धारणा निहित होती है और इसे चरित्र हनन का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

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