नई दिल्ली: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को वियतनाम और दक्षिण कोरिया की आधिकारिक यात्रा पर रवाना हो गए हैं। रक्षा मंत्री सिंह ने इन दो एशियाई देशों की यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों के और अधिक मजबूत होने की उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए रणनीतिक सैन्य सहयोग, रक्षा उद्योग की साझेदारी and समुद्री सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना है। रक्षा मंत्री सिंह १८ से १९ मई तक वियतनाम का दौरा करेंगे। दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी के १० वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह यात्रा हो रही है। इससे पहले वियतनामी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान इस साझेदारी को उच्च स्तर पर ले जाने की सहमति बनी थी। यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री सिंह वियतनाम के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इससे पहले जून २०२२ की उनकी वियतनाम यात्रा के दौरान वर्ष २०३० तक के लिए भारत-वियतनाम रक्षा साझेदारी संयुक्त दृष्टिकोण पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसने दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है। रक्षा मंत्री सिंह भियतनाम के पूर्व राष्ट्रपति हो ची मिन्ह की १३६वीं जयंती के अवसर पर उनके समाधि स्थल पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि भी अर्पित करेंगे।
वियतनाम की यात्रा पूरी करने के बाद रक्षा मंत्री सिंह १९ से २१ मई तक दक्षिण कोरिया के दौरे पर रहेंगे। कोरिया यात्रा के दौरान वह वहां के रक्षा मंत्री एन ग्यु-बेक के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर रक्षा सहयोग की समीक्षा करेंगे और नए पहलों पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही वह रक्षा अधिग्रहण कार्यक्रम प्रशासन के मंत्री ली योंग-चियोल से मुलाकात करेंगे और भारत-कोरिया बिजनेस राउंडटेबल की अध्यक्षता करेंगे। यात्रा के अंतिम दिन २१ मई को दक्षिण कोरिया में भारतीय युद्ध स्मारक का संयुक्त उद्घाटन किया जाएगा, जिसमें दक्षिण कोरियाई मंत्री क्वोन ओ-योल भी उपस्थित रहेंगे। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और दक्षिण कोरिया की इंडो-पैसिफिक रणनीति के बीच प्राकृतिक तालमेल ने दोनों देशों के संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ा है। कोरियाई युद्ध के दौरान वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भारत द्वारा दिए गए योगदान के इतिहास को इस यात्रा के दौरान विशेष महत्व के साथ याद किया जाएगा। युद्ध के समय भारत ने अपनी ६० प्यारासुट फिल्ड एम्बुलेंस तैनात की थी, जिसने ३ वर्ष से अधिक समय तक सेवा देते हुए २ लाख से अधिक मरीजों का इलाज और लगभग २५०० ऑपरेशन किए थे। इसी तरह, युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत गठित तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन आयोग की अध्यक्षता करते हुए भारत ने अपनी कस्टोडियन फोर्स के सैनिकों के माध्यम से लगभग २० हजार युद्धबंदियों को शांतिपूर्ण ढंग से स्वदेश वापस भेजने में अग्रणी भूमिका निभाई थी।











