काठमांडू: काठमांडू महानगर के मेयर पद से इस्तीफा देकर सीधे देश की सत्ता की बागडोर संभालने वाले प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ‘बालेन’ की सरकार ने अपना पहला महीना पूरा कर लिया है। ‘तेज रफ्तार’ और ‘नया आत्मविश्वास’ के नारों के साथ आई इस सरकार का शुरुआती सफर सुकुम्बासी बस्तियों पर डोजर चलाने और पूर्व प्रधानमंत्रियों की गिरफ्तारी जैसे बड़े फैसलों के लिए चर्चा में रहा।नदी किनारे की बस्तियों पर प्रहार प्रधानमंत्री शाह ने काठमांडू के थापाथली और सिनामंगल क्षेत्र में वर्षों से काबिज सुकुम्बासी बस्तियों को हटाने का काम शनिवार से शुरू कर दिया। महानगर प्रमुख रहते हुए जो काम वे अधूरा छोड़ गए थे, उसे प्रधानमंत्री बनते ही अंजाम देना शुरू किया। जहाँ एक ओर कानून का पालन करने वाले लोग इसकी सराहना कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने इसे बिना विकल्प के उजाड़ने वाला ‘अलोकतांत्रिक’ कदम बताया है।पूर्व प्रधानमंत्रियों की गिरफ्तारी और कानूनी बहस सरकार ने अपने पहले ही महीने में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को हिरासत में लेकर सबको चौंका दिया। भदौ के ‘जेनजी’ आंदोलन के दौरान बल प्रयोग के मामले में हुई इन गिरफ्तारियों को सर्वोच्च अदालत ने भले ही खारिज कर दिया हो, लेकिन बालेन सरकार ने अपना इरादा साफ कर दिया है। इसके अलावा, शेर बहादुर देउवा और आरजू राणा के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट ने पुरानी राजनीतिक पार्टियों में खलबली मचा दी है।सुधार और चुनौतियां सरकार ने ड्राइविंग लाइसेंस वितरण में तेजी लाने और सरकारी दफ्तरों से बिचौलियों को हटाने जैसे लोकप्रिय काम किए हैं। साथ ही, छात्र संगठनों और ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने जैसे फैसलों ने गंभीर बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि बालेन सरकार ‘फिल्मी नायक’ के अंदाज में काम करना चाहती है, जहाँ नतीजे तुरंत दिखें, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करना भविष्य में सरकार के लिए सिरदर्द बन सकता है।कुल मिलाकर, बालेन शाह का पहला महीना पारंपरिक सत्ता ढांचे को चुनौती देने वाला रहा है। अब देखना यह होगा कि १०० दिनों की कार्ययोजना और संविधान संशोधन जैसे बड़े वादे यह सरकार कैसे पूरे करती है।











