देवेंद्र के. ढुंगाना
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में नक्सलबाड़ी केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक वैचारिक विस्फोट का प्रतीक है। वर्ष १९६७ में शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने भारतीय वामपंथ को सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर अग्रसर किया और उसे राज्य की सत्ता के साथ सीधे टकराव में ला खड़ा किया। लेकिन समय के साथ वही आंदोलन आज राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय दिखाई देता है। सवाल उठता है- क्या वामपंथ वास्तव में समाप्त हो गया है, या वह नए रूप में स्वयं को पुनर्गठित कर रहा है?
वर्तमान परिदृश्य में देखें तो पूर्वी–मध्य भारत में माओवादी आंदोलन का प्रभाव काफी हद तक कमजोर हो चुका है। सुरक्षा रणनीतियों, विकास कार्यक्रमों और स्थानीय राजनीतिक समायोजन के कारण सशस्त्र विद्रोह की जमीन सिकुड़ गई है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि वामपंथी विचारधारा समाप्त हो गई है। बल्कि यह एक परिवर्तन का दौर है, जहां बंदूक की जगह मतपत्र ने ले ली है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है, आज फिर से रणनीतिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हो गया है। यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्व भारत को मुख्य भूमि से जोड़ने वाली जीवनरेखा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव विस्तार का एक संवेदनशील क्षेत्र भी है। नक्सलबाड़ी आंदोलन का उद्गम स्थल इसी क्षेत्र में होने के कारण इसका प्रतीकात्मक महत्व आज भी बना हुआ है।
वर्तमान विधानसभा चुनाव में वामपंथी दल, विशेष रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अपने खोए हुए आधार को वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रयास केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। एक समय बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा आज हाशिए पर पहुंच चुका है, और इसी संदर्भ में उसकी सक्रियता को समझना जरूरी है।
रणनीतिक रूप से देखें तो वामपंथ अब सीधे टकराव की राजनीति छोड़कर सहयोग और गठबंधन की राह पर आगे बढ़ रहा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, डुआर्स और उत्तर-पूर्वी हिमालयी जिलों में वे स्थानीय जातीय, भाषाई और आर्थिक असंतोष को राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं। चाय बागान के श्रमिक, आदिवासी समुदाय और सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग आज भी विकास और प्रतिनिधित्व की कमी महसूस करते हैं, यही वह जगह है जहां वामपंथ अपनी वापसी की जमीन तलाश रहा है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। एक ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस क्षेत्रीय पहचान और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपनी पकड़ मजबूत किए हुए है। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा राष्ट्रवाद, सुरक्षा और ‘जनसंख्या परिवर्तन’ जैसे मुद्दों को उठाकर ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है। ऐसे में वामपंथ के लिए अपनीu अलग पहचान बनाना कठिन होता जा रहा है।
वामपंथ की सबसे बड़ी कमजोरी समय के अनुसार वैचारिक लचीलापन न दिखा पाना रही है। जब दुनिया भर में कम्युनिस्ट आंदोलन ने सुधार और उदारीकरण की राह पकड़ी, तब भारतीय वामपंथ पुराने ढांचे में ही अटका रहा। बुद्धदेब भट्टचार्य ने औद्योगीकरण के माध्यम से बदलाव लाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ा। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों ने न केवल एक औद्योगिक परियोजना को रोका, बल्कि वामपंथ के राजनीतिक भविष्य को भी गहरा झटका दिया।
वर्तमान चुनाव में वामपंथी सक्रियता मुख्य रूप से दो स्तरों पर दिखती है। पहला, संगठन का पुनर्निर्माण- स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करना। दूसरा, वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श, ध्रुवीकरण और व्यक्तिवादी राजनीति से हटकर वर्गीय और आर्थिक मुद्दों को केंद्र में लाना। फिर भी सवाल बना हुआ है- क्या यह पर्याप्त होगा?
सिलीगुड़ी कॉरिडोर में उनकी रणनीति स्पष्ट नजर आती है। क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता, सीमावर्ती राजनीति और सामाजिक विविधता को आधार बनाकर वे अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह क्षेत्र फिलहाल भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर का केंद्र बना हुआ है, जहां वामपंथ तीसरी ताकत के रूप में सीमित दिखाई देता है।
भारतीय राष्ट्रीय राजनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा? निकट भविष्य में बड़े बदलाव की संभावना कम है। लेकिन दीर्घकाल में, यदि वामपंथ अपनी रणनीति को सफलतापूर्वक लागू कर पाता है, तो वह फिर से ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकता है, खासकर गठबंधन राजनीति के दौर में। संसद में कम सीटों के बावजूद निर्णायक भूमिका निभाने की संभावना अब भी बनी हुई है।
अंततः, नक्सलबाड़ी की विरासत केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान का संकेत भी है। सशस्त्र संघर्ष से संसदीय राजनीति की ओर बदलाव ने वामपंथ को एक नया अवसर दिया है। लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए वैचारिक स्पष्टता, संगठनात्मक मजबूती और समय के अनुरूप रणनीति की आवश्यकता है।
आज भित्तियों पर लिखे क्रांतिकारी नारे भले ही फीके पड़ रहे हों, लेकिन राजनीति अब भी गतिशील है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में एक बार फिर शक्ति-संतुलन का नया खेल शुरू हो चुका है। वामपंथ के लिए यह शायद आखिरी अवसर हाे, इतिहास की स्मृतियों से बाहर निकलकर वर्तमान में खुद को नए सिरे से परिभाषित करने का।










