नए प्रधानमंत्री—समयसीमा, संभावना और राजनीतिक परीक्षा की घड़ी

IMG-20260317-WA0019

देवेंद्र किशोर ढुंगाना

भद्रपुर: नेपाल के हालिया चुनावी परिणामों के बाद देश का राजनीतिक परिदृश्य इस समय नई सरकार के गठन और प्रधानमंत्री की नियुक्ति को लेकर गर्माया हुआ है। संविधान ने स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है, बहुमत दल उभर कर सामने आया है, और नेतृत्व का दावा भी पहले से सार्वजनिक किया जा चुका है। ऐसे में इस बार सरकार गठन की प्रक्रिया ऊपर से सामान्य दिख सकती है, लेकिन इसकी आंतरिक राजनीतिक जटिलताओं और संस्थागत चुनौतियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
संविधान के अनुसार प्रतिनिधि सभा के अंतिम परिणाम घोषित होने के ३५ दिनों के भीतर प्रधानमंत्री की नियुक्ति हो जानी चाहिए। इस हिसाब से वैशाख १० अंतिम समयसीमा है। हालांकि राजनीतिक संकेत यह बताते हैं कि इस समयसीमा तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। निर्वाचन आयोग द्वारा चैत ५ तक अंतिम प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपे जाने के बाद सरकार गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके बाद बहुमत प्राप्त दल अपने संसदीय दल के नेता का चयन कर राष्ट्रपति के समक्ष दावा प्रस्तुत करेगा।
इस बार की विशेषता यह है कि—यदि दावे के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के पास स्पष्ट बहुमत है, तो सरकार गठन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सहज होनी चाहिए। लेकिन नेपाली राजनीति केवल संख्याओं का खेल नहीं है; यहां मनोविज्ञान, शक्ति संतुलन, आंतरिक गुटबंदी और बाहरी प्रभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
रास्वपा द्वारा बालेन्द्र शाह (बालेन) को प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ाने की घोषणा अपने आप में पारंपरिक राजनीति के लिए एक चुनौतीपूर्ण संकेत है। एक स्वतंत्र छवि वाले लोकप्रिय शहरी नेता को राष्ट्रीय स्तर के कार्यकारी नेतृत्व में लाने का प्रयास जनता में उत्साह पैदा करता है। लेकिन यहीं से कुछ गंभीर सवाल भी उठते हैं—क्या केवल लोकप्रियता पर्याप्त है? क्या प्रशासनिक अनुभव और संघीय राजनीतिक व्यवस्था की जटिलताओं को संभालने के लिए आवश्यक संरचना तैयार है? और सबसे महत्वपूर्ण, पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन कैसा रहेगा?
संविधान के अनुच्छेद ७६(१) के अनुसार बहुमत प्राप्त दल के संसदीय दल के नेता को ही प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि अंतिम निर्णय पार्टी के भीतर ही होता है। रास्वपा के विधान के अनुसार संसदीय दल के नेता के चयन की प्रक्रिया लंबी और जटिल मानी जा रही है। यदि इसी प्रक्रिया में विवाद या देरी होती है, तो “जल्द प्रधानमंत्री” बनने का दावा कमजोर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति कार्यालय की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि राष्ट्रपति को संवैधानिक रूप से बहुमत दल के नेता को ही नियुक्त करना होता है, लेकिन प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं, दावे की पुष्टि और आवश्यक दस्तावेजों की पूर्ति में कुछ समय लग सकता है। इसलिए चैत ९ या १० को ही शपथ होने का दावा संभावनाओं के दायरे में तो है, लेकिन पूरी तरह निश्चित नहीं।
इस बीच एक और बहस उभर कर आई है—क्या प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति को पहले सांसद के रूप में शपथ लेनी चाहिए या नहीं? पूर्व के अभ्यास और संवैधानिक व्याख्याओं के अनुसार, यदि बहुमत स्पष्ट है तो राष्ट्रपति संसद की पहली बैठक से पहले भी प्रधानमंत्री की नियुक्ति कर सकते हैं। यह प्रक्रिया को तेज कर सकता है, लेकिन संवैधानिक शुद्धता और परंपरागत अभ्यास के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो वर्तमान स्थिति केवल नए प्रधानमंत्री के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेपाल की लोकतांत्रिक प्रणाली की परिपक्वता की भी परीक्षा है। लंबे समय से अस्थिरता, गठबंधन राजनीति और बार-बार सरकार परिवर्तन का अनुभव कर चुके देश के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकार एक अवसर है—नीतिगत निरंतरता, दीर्घकालिक योजना और सुशासन को लागू करने का।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि बहुमत अपने आप में स्थिरता की गारंटी नहीं है। बहुमत का दुरुपयोग, आंतरिक संघर्ष और जन अपेक्षाओं को पूरा न कर पाने की स्थिति में वही सरकार संकट में पड़ सकती है। इसलिए रास्वपा के लिए यह केवल सत्ता प्राप्ति का अवसर नहीं, बल्कि अपने वादों और वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति को साबित करने की चुनौती भी है।
जनता ने इस बार परिवर्तन की उम्मीद में मतदान किया है। पारंपरिक दलों से निराशा, भ्रष्टाचार और अक्षमता के प्रति असंतोष, और नए चेहरों के प्रति आकर्षण ने यह परिणाम संभव बनाया है। अब यदि इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया गया, तो निराशा और गहरी हो सकती है। विशेष रूप से बालेन जैसे व्यक्तित्व से जुड़ी “आशा” यदि व्यवहार में नहीं उतर पाई, तो इसका राजनीतिक प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है।
अंततः, नया प्रधानमंत्री कब नियुक्त होगा—यह प्रश्न केवल तारीख का नहीं है; यह प्रक्रिया, पारदर्शिता और राजनीतिक परिपक्वता से भी जुड़ा हुआ है। संवैधानिक रूप से वैशाख १० तक नियुक्ति अनिवार्य है, लेकिन राजनीतिक रूप से देश त्वरित निर्णय की अपेक्षा कर रहा है।
आने वाले कुछ दिन नेपाल के लिए निर्णायक होंगे। यदि प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी होती है, तो यह लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत करेगी। लेकिन यदि आंतरिक विवाद, देरी या शक्ति संघर्ष हावी हुआ, तो इसका असर केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र पर पड़ेगा।
इसलिए आज की आवश्यकता केवल प्रधानमंत्री की नियुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व, स्पष्ट दिशा और जनता की अपेक्षाओं के प्रति ईमानदार प्रतिबद्धता है। नई सरकार की सफलता केवल शपथ लेने से शुरू नहीं होती, बल्कि यह जनता का विश्वास जीतने की निरंतर प्रक्रिया से साबित होती है।

About Author

Advertisement