देश मे शासकीय सुधार एजेंडा पर मिली-जुली प्रतिक्रिया, लागू करना चुनौतीपूर्ण पर संभव

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काठमांडू: प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए ‘शासकीय सुधार कार्यसूची’ को लेकर विभिन्न सरोकारवालों ने इसे चुनौतीपूर्ण लेकिन संभव बताया है।
सरकार ने मंत्रिपरिषद की पहली बैठक में पारित इस कार्यसूची को सार्वजनिक किया, जिसमें प्रशासनिक, राजनीतिक, सामाजिक न्याय और सेवा सुधार से जुड़े १०० बिंदु शामिल हैं।
कार्यसूची में क्या है?
कार्यसूची में दलित और वंचित समुदायों से १५ दिनों के भीतर औपचारिक माफी मांगने, संविधान संशोधन के लिए सहमति निर्माण, और भदौ २३–२४ की घटनाओं की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठन जैसे प्रावधान शामिल हैं।
इसके अलावा मंत्रालयों की संख्या घटाकर १७ कर ने, अनावश्यक संस्थाओं के पुनर्गठन, सार्वजनिक सेवाओं को डिजिटल बनाने, और नागरिक शिकायत प्रणाली को मजबूत करने की योजना भी शामिल है।
स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में अस्पतालों में १० प्रतिशत बेड मुफ्त उपलब्ध कराने, ‘फ्री हेल्थ पोर्टल’ शुरू करने तथा प्राथमिक कक्षाओं में आंतरिक परीक्षा समाप्त करने जैसे प्रस्ताव भी रखे गए हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रकाशकुमार श्रेष्ठ का कहना है कि अधिकांश प्रस्ताव पहले भी विभिन्न योजनाओं में शामिल थे, लेकिन अब उन्हें नए संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
कार्यान्वयन कितना संभव?
विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय संसाधन और जनशक्ति की कमी बड़ी चुनौती हो सकती है, हालांकि राजनीतिक इच्छाशक्ति से इसे लागू किया जा सकता है।
आलोचकों ने कहा है कि कार्यसूची में द्वंद्वपीड़ितों और वैदेशिक रोजगार से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई है।

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