बेबी चक्रवर्ती
लगभग २०० वर्षों के ब्रिटिश शासन के बाद करोड़ों बंगालियों की स्मृतियों से जुड़ी यह ऐतिहासिक जगह आज भी दर्शकों के मन में रोमांच और भावनात्मक अनुभूति जगाती है। बीबीडी बाग के लालदिघी के उत्तरी छोर के साथ लगभग १५० मीटर लंबा यह भवन १७७७ में स्थापित हुआ था। इसके स्थापत्यकार थॉमस लियोन थे। बीते दो शताब्दियों में इस भवन के भीतर अनेक परिवर्तन और विस्तार किए गए हैं।
जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ा रही थी, तब कर व्यवस्था को संगठित करने के लिए एक प्रशासनिक भवन की आवश्यकता महसूस हुई। इसी उद्देश्य से यह भवन बनाया गया, जहाँ लेखाकारों के रहने और काम करने की व्यवस्था थी। प्लासी का युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की पराजय के बाद यह भवन कंपनी का मुख्यालय बना और आगे चलकर पूरे भारत में ब्रिटिश शासन का प्रमुख केंद्र बन गया।
करीब २०० वर्षों तक यह महाकरण ब्रिटिश शक्ति का केंद्र रहा। १९४७ में स्वतंत्रता के बाद यह पश्चिम बंगाल सरकार का मुख्य प्रशासनिक भवन बना। इस ऐतिहासिक इमारत ने अनेक राजनीतिक आंदोलनों, विरोधों और संघर्षों को देखा है। समय के साथ कलकत्ता, कोलकाता शहर के हृदयस्थल में स्थित यह भवन फोर्ट विलियम की भूमि पर निर्मित हुआ, जहाँ १७५६ तक कंपनी की सैन्य व्यवस्था थी। इस क्षेत्र को उस समय “श्वेत नगरी” कहा जाता था, क्योंकि केवल अंग्रेज व्यापारियों को यहाँ कार्यालय खोलने की अनुमति थी।
१७७७ से १७८० के बीच राइटर्स बिल्डिंग के शीर्ष पर रोमन देवी मिनर्वा की प्रतिमा स्थापित की गई। थॉमस लियोन मूलतः इंग्लैंड में एक बढ़ई थे और उन्हें रिचर्ड बारवेल के अधीन इस भवन के निर्माण की जिम्मेदारी मिली। वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस परियोजना की देखरेख की। लगभग ३७,८५० वर्ग फुट क्षेत्र में फैला यह भवन १७८० में पूरा हुआ।
निर्माण के कुछ समय बाद ही यहाँ फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई, जहाँ कर्मचारियों को फ़ारसी और हिंदी भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता था। कॉलेज के लिए छात्रावास, परीक्षा कक्ष और विभिन्न भाषाओं की कक्षाएँ बनाई गईं। तीन मंजिला इस भवन में दूसरी और तीसरी मंजिल पर १२८ फुट लंबी बरामदे सुंदर स्तंभों के साथ जोड़ी गईं।
हालाँकि प्रशासनिक मतभेदों के कारण यह कॉलेज अधिक समय तक यहाँ नहीं रहा और बाद में इसे स्थानांतरित कर दिया गया। उन्नीसवीं सदी में जब कोलकाता ब्रिटिश भारत की राजधानी बना, तब इस भवन में पंद्रह खंड जोड़े गए, जो आपस में जुड़े थे। पोर्टिको में ग्रीक देवताओं- ज़्यूस, हर्मीस, एथेना और डेमेटर-की मूर्तियाँ स्थापित की गईं, जो न्याय, वाणिज्य, विज्ञान और कृषि का प्रतीक हैं।
१९३० में कुख्यात अधिकारी एन. एस. सिम्पसन की हत्या बिनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने की। इन क्रांतिकारियों ने कुछ समय के लिए भवन पर कब्ज़ा कर ब्रिटिश पुलिस से मुठभेड़ की। असमान संघर्ष को देखते हुए बादल ने विष लेकर आत्मबलिदान दिया, जबकि बिनय और दिनेश ने स्वयं को गोली मारी। पाँच दिन बाद बिनय की मृत्यु हुई, जबकि दिनेश को बाद में ७ जुलाई १९३१ को फाँसी दी गई। इन तीनों शहीदों के नाम पर डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर बीबीडी बाग रखा गया।
स्वतंत्रता के बाद विधान चंद्र राय, प्रफुल्ल सेन और सिद्धार्थ शंकर राय जैसे नेताओं ने यहाँ से शासन किया। १९७७ में वाम मोर्चा सरकार के सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने २०११ तक ३४ वर्षों तक इसी भवन से प्रशासन चलाया।
२०११ में ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद २०१३ में प्रशासनिक कार्यालयों को अस्थायी रूप से नवान्न स्थानांतरित कर दिया गया।
महाकरण के इस धरोहर भवन के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए लगभग २०० करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की गई। अब भी कुछ सरकारी कार्यालय यहाँ कार्यरत हैं और पूर्ण मरम्मत का कार्य जारी है। आज भी इस भवन के पास से गुजरते समय लोगों के मन में इतिहास की स्मृतियाँ जाग उठती हैं और यह स्थान भावनाओं से भर देता है।










