त्रिवि: गौरव से संकट तक की यात्रा

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देवेंद्र के ढुंगाना

नेपाल की उच्च शिक्षा प्रणाली की रीढ़ मानी जाने वाली त्रिभुवन विश्वविद्यालय आज अपने इतिहास के सबसे जटिल मोड़ पर खड़ी है। एक समय राष्ट्र के बौद्धिक नेतृत्व, प्रशासनिक जनशक्ति, वैज्ञानिक तथा सामाजिक अभियंता तैयार करने वाली यह गौरवशाली संस्था आज प्रशासनिक अनिश्चितता, नीति अस्थिरता, शिक्षक असंतोष और संस्थागत न्याय से जुड़े प्रश्नों से घिरी हुई है। प्राध्यापकों की 66वें दिन तक पहुँच चुकी हड़ताल केवल पेंशन सुविधा की मांग नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय के समग्र स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर एक गंभीर चिंता की अभिव्यक्ति है।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय का इतिहास नेपाल के आधुनिक शैक्षिक विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है। 2016 साल (स्थापना वर्ष) में स्थापित इस विश्वविद्यालय ने सीमित संसाधनों के बावजूद देश के बौद्धिक और तकनीकी मानव संसाधन के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। दशकों तक विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और कर्मचारी व्यक्तिगत सुविधाओं से अधिक संस्थागत विकास को प्राथमिकता देते हुए शिक्षा, अनुसंधान और ज्ञान निर्माण में समर्पित रहे। लेकिन आज उसी संस्थान के कई शिक्षक और कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा से भी वंचित हैं, जो एक विडंबनापूर्ण स्थिति है।
पेंशन का मुद्दा केवल आर्थिक लाभ का प्रश्न नहीं है; यह संस्थागत न्याय, समानता और श्रम के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है। समान सेवा अवधि और समान जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारियों में से कुछ को पेंशन मिलना और कुछ को इससे वंचित रहना किसी भी लोकतांत्रिक और उत्तरदायी व्यवस्था में अस्वाभाविक माना जाता है। इसी असमानता ने शिक्षक समुदाय में गहरी निराशा और असंतोष पैदा किया है।
प्रा. डा. विनोद पराजुली आयोग की रिपोर्ट ने भी लंबे समय तक सेवा देने वाले शिक्षक एवं कर्मचारियों को पेंशन सुविधा देने की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी केंद्रीय पेंशन कोष के निर्माण और वित्तीय स्रोतों के प्रबंधन की दिशा में प्रारंभिक प्रयास शुरू किए हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक इच्छाशक्ति और निर्णय प्रक्रिया की गति की है। आवश्यक संरचना तैयार होने के बावजूद निर्णय में हो रही देरी विश्वविद्यालय के भीतर अविश्वास का माहौल पैदा कर रही है।
वर्तमान आंदोलन ने त्रिवि की एक और गंभीर समस्या को उजागर किया है—नीतिगत नेतृत्व का अभाव। विश्वविद्यालय केवल भवन, पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली से नहीं चलता; इसकी नींव शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थियों के बीच विश्वास पर टिकी होती है। जब यह विश्वास कमजोर होता है, तो शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुसंधान क्षमता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
भविष्य की दृष्टि से त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सामने दो विकल्प दिखाई देते हैं। पहला, पुरानी ढिलाई, असमानता और प्रशासनिक जटिलताओं में फंसे रहकर संकट को और गहरा करना; दूसरा, शिक्षक और कर्मचारियों की जायज मांगों को संबोधित करते हुए सामाजिक सुरक्षा, सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित सुधारों की नई शुरुआत करना। इनमें से दूसरा विकल्प ही दीर्घकालिक रूप से विश्वविद्यालय के हित में है।
आज पेंशन बहस वास्तव में त्रिवि के आत्म-मूल्यांकन का अवसर भी है। विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों और कर्मचारियों को कितना सम्मान देता है, यही उसकी नैतिक ऊँचाई को निर्धारित करता है। यदि देश की सबसे बड़ी बौद्धिक संस्था अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित नहीं कर पाती, तो यह पूरे उच्च शिक्षा प्रणाली पर भरोसे को कमजोर करता है।
अंततः, त्रिभुवन विश्वविद्यालय का वर्तमान संकट केवल शिक्षकों के आंदोलन की खबर नहीं है; यह नेपाल की उच्च शिक्षा प्रणाली के भविष्य से जुड़ा एक राष्ट्रीय विमर्श है। यदि पेंशन सुविधा सुनिश्चित करते हुए संस्थागत न्याय स्थापित किया जा सके, तो यह आंदोलन एक सकारात्मक मोड़ बन सकता है। अन्यथा, आज का असंतोष कल एक गहरे शैक्षिक संकट में बदल सकता है।

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