देवेन्द्र किशोर ढुंगाना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने से केवल मध्यपूर्व ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति भी एक बार फिर तनावपूर्ण मोड़ की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ वे युद्धविराम और समझौते की उम्मीद जताते हैं, तो दूसरी ओर “कड़े कदम” उठाने की धमकी भी देते हैं। उनके इन विरोधाभासी संदेशों ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है कि अमेरिका आखिर किस रणनीतिक दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ईरान पर अमेरिका दशकों से आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव की नीति अपनाता आया है। लेकिन आज की वैश्विक परिस्थिति पहले से काफी अलग है। रूस–यूक्रेन युद्ध, चीन का बढ़ता प्रभाव, ब्रिक्स देशों का विस्तार और अमेरिकी वर्चस्व को मिल रही चुनौती के बीच ईरान पर दबाव अब केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा विषय बन चुका है।
ट्रम्प के हालिया बयान उनकी पुरानी “दबाव के जरिए समझौता” वाली विदेश नीति को फिर से जीवित करते दिखाई देते हैं। एक दिन वे “दीर्घकालिक शांति” की बात करते हैं, तो अगले ही दिन “हमले के फैसले से केवल एक घंटे दूर” होने की चेतावनी देते हैं। इससे न केवल ईरान बल्कि अमेरिका के सहयोगी देश भी असमंजस में पड़ गए हैं।
विशेष रूप से बेंजमीन नेतान्याहु के नेतृत्व वाला इज़राइल ईरान के खिलाफ और अधिक कठोर सैन्य कार्रवाई चाहता है, ऐसा संकेत अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में देखने को मिला है। ऐसे में ट्रम्प पर दोहरी राजनीतिक चुनौती दिखाई देती है—एक ओर इज़राइल समर्थक शक्तियों का दबाव, दूसरी ओर युद्ध का अमेरिकी अर्थव्यवस्था और घरेलू राजनीति पर पड़ने वाला प्रभाव।
ईरान के साथ तनाव का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व तेल आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। यदि अमेरिका या इज़राइल सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाते हैं, तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई और आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पहले से आर्थिक संकट झेल रहे यूरोपीय देशों के लिए यह स्थिति और अधिक कठिन बन सकती है।
इसके अलावा, ईरान पर अत्यधिक दबाव बनाने की अमेरिकी रणनीति चीन और रूस को भी मध्यपूर्व में अधिक सक्रिय कर सकती है। चीन पहले ही ईरान के साथ दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी कर चुका है, जबकि रूस पश्चिमी दबाव के खिलाफ ईरान को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। इसलिए अमेरिका का कोई भी कठोर कदम वैश्विक राजनीति में नए ध्रुवीकरण को तेज कर सकता है।
ट्रम्प समर्थक उनकी अनिश्चित शैली को “मैड मैन डिप्लोमेसी” यानी विरोधी को मानसिक दबाव में रखने की रणनीति बताते हैं। लेकिन आलोचकों के अनुसार यह स्पष्ट रणनीतिक सोच से अधिक राजनीतिक दुविधा है। ट्रम्प एक ओर स्वयं को एक शक्तिशाली नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें यह भी भय है कि यदि अमेरिका लंबे युद्ध में फँसता है, तो घरेलू जनमत उनके खिलाफ जा सकता है।
असल में, अमेरिका का ईरान पर दबाव बनाए रखने का उद्देश्य केवल उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकना नहीं है। इसका गहरा संबंध मध्यपूर्व में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखने की रणनीति से भी है। वॉशिंगटन को यह चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि यदि ईरान क्षेत्रीय शक्ति के रूप में और अधिक मजबूत हुआ, तो अमेरिकी गठबंधन कमजोर पड़ सकता है।
लेकिन बदलती वैश्विक व्यवस्था में पुरानी दबाव की राजनीति शायद पहले जितनी प्रभावी नहीं रह गई है। अब कई देश अमेरिकी नीतियों से अलग स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं। आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य धमकियों की बजाय संवाद, बहुध्रुवीय कूटनीति और क्षेत्रीय सहयोग को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।
इसी कारण ट्रम्प की हालिया चेतावनी को केवल एक नेता का बयान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह वैश्विक राजनीति में उभरते शक्ति संघर्ष का संकेत भी है। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं, तो मध्यपूर्व को अस्थायी राहत मिल सकती है। लेकिन यदि धमकी और सैन्य दबाव की राजनीति जारी रही, तो इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था से लेकर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था तक गंभीर रूप से फैल सकता है।
आज जब दुनिया युद्ध की बजाय संवाद की तलाश कर रही है, तब अमेरिका–ईरान तनाव एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—क्या विश्व फिर से शक्ति प्रदर्शन की राजनीति की ओर लौट रहा है, या वह नए कूटनीतिक संतुलन की खोज में आगे बढ़ रहा है?









