जहां गुलाल नहीं, पंखुड़ियों से सजती हैं होली की खुशियां

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दृष्टिबाधित बच्चों की समावेशी होली बनी मिसाल

कोलकाता: जैसे ही बसंत की आहट और आसमान के रंग बदलते हैं, शहर में होली की तैयारियां तेज हो जाती हैं। दक्षिण कोलकाता स्थित लाइट हाउस फॉर दि ब्लाइंड स्कूल
में होली कुछ अलग अंदाज में मनाई जाती है। यहाँ रंगों की बजाय फूलों की होली,‘फुलडोल’ का उत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष इस अनोखी परंपरा को १२ साल पूरे हो गए हैं।
दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं के लिए होली का मतलब अबीर-गुलाल नहीं, बल्कि स्पर्श और सुगंध की अनुभूति है। स्कूल के प्रधान शिक्षक अमिय सतपथी के अनुसार, २०१४ से रासायनिक रंगों के खतरों से बचाने के लिए यह परंपरा अपनाई गई है।
गुलाब, गेंदे और रजनीगंधा की पंखुड़ियां बच्चों के उत्सव को रंगीन बनाती हैं। फूलों की खुशबू, एक-दूसरे को पहनाई जाने वाली मालाएं और गीत-संगीत से पूरा परिसर महक उठता है। यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समावेशन का संदेश है—परंपराओं को इस तरह ढालना कि हर कोई उसमें बराबरी से शामिल हो सके।
स्कूल में इतिहास के शिक्षक के रूप में पाँच वर्षदेखि पढ़ा रहे दिलीप साव, जो स्वयं दृष्टिहीन हैं, भी बच्चों के साथ फूलों के रंग खेलने में शामिल होने को लेकर उत्साहित हैं। उनका मानना है कि एक दिन ये बच्चे ही आकाश को छूएंगे।


कोलकाता की यह ‘फुलडोल’ होली बताती है कि असली रंग आंखों से नहीं, दिल से महसूस किए जाते हैं।

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