—देवेन्द्र के. ढुंगाना
काठमांडू से विश्व मंच पर जलवायु न्याय की आवाज उठाते हुए नेपाल स्वयं जलवायु संकट की कठोर प्रयोगशाला बनता जा रहा है। हिमालय से लेकर तराई तक बदलता तापमान, अनियमित वर्षा, अत्यधिक वर्षा, सूखा, जंगल की आग, बाढ़, भूस्खलन, हिमताल विस्फोट और हिमनदों के तेजी से पिघलने की घटनाओं ने नेपाल की अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, कृषि, पर्यटन, जलस्रोत और जनजीवन पर बहुआयामी दबाव पैदा कर दिया है। हाल की रसुवा–भोटेकोशी बाढ़ ने इस संकट को एक बार फिर भयावह तथ्य में बदल दिया है—जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संभावित खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान का प्रत्यक्ष राष्ट्रीय संकट है।
सन् दो हजार छब्बीस के अगस्त महीने की छब्बीस तारीख को आई रसुवा–भोटेकोशी क्षेत्र की विनाशकारी बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं, व्यापारिक संरचनाओं और मानवीय जीवन को भारी नुकसान पहुँचाया। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रारंभिक त्वरित क्षति तथा आवश्यकता आकलन के अनुसार इस आपदा से चार खरब आठ अरब अट्ठाईस करोड़ नेपाली रुपये से अधिक की क्षति तथा नुकसान का अनुमान लगाया गया है, जबकि पुनर्निर्माण और पुनर्स्थापना के लिए सात खरब तेईस अरब इकतीस करोड़ नेपाली रुपये से अधिक की आवश्यकता पड़ने का अनुमान है। सात हजार पाँच सौ सत्तर निजी घर, अठारह विद्यालय, सात स्वास्थ्य संस्थाएँ, तीस सांस्कृतिक धरोहरें, उनतालीस किलोमीटर से अधिक सड़कें, सैंतीस मोटर योग्य पुल और अड़सठ झूला पुल प्रभावित हुए हैं। तेरह जलविद्युत परियोजनाओं और पाँच सौर ऊर्जा परियोजनाओं के प्रभावित होने से ऊर्जा क्षेत्र में भी पुनर्स्थापना की भारी आवश्यकता दिखाई देती है।
मानवीय क्षति का वास्तविक आकार अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है। सितंबर के तीसरे सप्ताह तक सरकारी अभिलेखों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या लगातार अद्यतन की जा रही थी। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण के अद्यतन विवरण के अनुसार सितंबर की उन्नीस तारीख तक एक हजार चार सौ ग्यारह लोगों की मृत्यु और पाँच हजार आठ सौ पचहत्तर लोगों के लापता होने का उल्लेख था। खोज तथा बचाव अभियान के दौरान तेरह हजार सात सौ से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया था। विश्व बैंक ने भी इस आपदा को गंभीर मानवीय और बुनियादी ढाँचे की क्षति वाली घटना बताते हुए तत्काल आपातकालीन प्रतिक्रिया तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की पुनर्स्थापना के लिए एक सौ सत्तर मिलियन अमेरिकी डॉलर तक की आपातकालीन वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की है।
लेकिन सवाल केवल यह नहीं है कि बाढ़ कितनी बड़ी थी। मूल सवाल यह है कि ऐसे जोखिम का पूर्वानुमान, पूर्वतैयारी और जोखिम न्यूनीकरण करने के मामले में नेपाल कितना तैयार था? प्राकृतिक आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उससे होने वाली मानवीय और आर्थिक क्षति को कितना कम किया जा सकता था—यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। रसुवा–भोटेकोशी की घटना ने नेपाल में आपदा प्रबंधन अभी भी काफी हद तक आपदा आने के बाद बचाव, राहत और पुनर्निर्माण पर केंद्रित रहने तथा जोखिम की पहचान, पूर्व कार्रवाई और जलवायु–सहनशील बुनियादी ढाँचे के निर्माण में अपेक्षित गति नहीं आने की बहस को और मजबूत किया है।
नेपाल सरकार इस कमजोरी को दूर करने के लिए संस्थागत और नीतिगत स्तर पर विभिन्न कदम आगे बढ़ा रही है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण जोखिम मानचित्रण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और आपदा सुरक्षा अभ्यास को संस्थागत बनाते हुए प्रतिक्रियामुखी के बजाय पूर्वतैयारी आधारित आपदा प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ने की नीति अपना रहा है। सन् दो हजार छब्बीस की मानसून पूर्वतैयारी तथा प्रतिक्रिया संबंधी राष्ट्रीय कार्ययोजना भी स्वीकृत की गई है। बाढ़ के दौरान उपग्रह चित्रों के विश्लेषण के माध्यम से ल्हेन्दे खोला में बने तालाब की पहचान कर निचले तटीय क्षेत्रों को दोबारा बाढ़ आने की संभावना के बारे में चेतावनी देना राज्य तंत्र में आधुनिक जोखिम सूचना प्रणाली के बढ़ते उपयोग का एक उदाहरण है।
लेकिन तकनीक का होना और उसका प्रभावी इस्तेमाल होना एक ही बात नहीं है। प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की सफलता सूचना तैयार करने में नहीं, बल्कि सूचना को समय पर जोखिम में रहने वाले लोगों तक पहुँचाकर उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने की क्षमता में मापी जाती है। पहाड़ी बस्तियों में मोबाइल नेटवर्क बाधित हो सकता है, सड़क संपर्क टूट सकता है, रात के समय आपदा आ सकती है या नदी का बहाव कुछ ही समय में खतरनाक स्तर तक पहुँच सकता है। ऐसी स्थिति में केवल चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय सरकारों के पास बचाव सामग्री, सुरक्षित आश्रय, प्रशिक्षित जनशक्ति, वैकल्पिक संचार माध्यम और तत्काल इस्तेमाल किए जा सकने वाले संसाधन होने चाहिए। अत्याधुनिक पूर्वानुमान भी तब कमजोर पड़ सकता है जब स्थानीय स्तर पर उस सूचना के आधार पर तत्काल कार्रवाई करने की क्षमता न हो। इसलिए नेपाल की जलवायु नीति अब केवल मौसम विभाग या पर्यावरण मंत्रालय का विषय नहीं रह सकती। इसे गृह प्रशासन, सड़क, ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यटन, भूमि प्रबंधन और स्थानीय सरकारों की साझा कार्यसूची बनाना होगा।
वैज्ञानिक आकलन भी संकेत देते हैं कि नेपाल में जलवायु जोखिम बढ़ रहा है। नेपाल के तीसरे राष्ट्रीय निर्धारित योगदान दस्तावेज में तापमान वृद्धि के साथ हिमनदों के पिघलने, जैव विविधता के क्षरण तथा बाढ़, सूखा, भूस्खलन, हिमताल विस्फोट, जंगल की आग और गर्म हवाओं जैसी चरम घटनाओं के जोखिम बढ़ने का उल्लेख किया गया है। नेपाल ने सन् दो हजार पैंतालीस तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को शून्य करने के दीर्घकालीन लक्ष्य को अपनी जलवायु नीति से जोड़ा है।
नेपाल की विडंबना यह है कि वैश्विक हरितगृह गैस उत्सर्जन में उसका योगदान बेहद कम है, लेकिन जलवायु जोखिम असमान रूप से बहुत अधिक है। नेपाल द्वारा सन् दो हजार पच्चीस में प्रस्तुत तीसरे राष्ट्रीय निर्धारित योगदान के अनुसार सन् दो हजार तीस तक के मात्रात्मक उत्सर्जन न्यूनीकरण लक्ष्यों का लगभग छियानवे प्रतिशत और सन् दो हजार पैंतीस तक के लक्ष्यों का लगभग सत्तानबे प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त तथा सहयोग पर निर्भर है। इन लक्ष्यों के कार्यान्वयन के लिए सन् दो हजार पैंतीस तक कुल तिहत्तर अरब चौहत्तर करोड़ अमेरिकी डॉलर के बराबर अनुमानित लागत बताई गई है और इसमें पचासी प्रतिशत से अधिक राशि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग से जुटाने की आवश्यकता बताई गई है।
यही तथ्य बताता है कि नेपाल के लिए जलवायु न्याय की मांग क्यों महत्वपूर्ण है। लेकिन जलवायु न्याय की मांग करने वाले नेपाल के अपने घर के भीतर भी न्यायपूर्ण और प्रभावी जलवायु शासन आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अनुदान आधारित जलवायु वित्त, हानि तथा क्षति कोष और रियायती वित्तीय सहायता की मांग करते समय देश के भीतर प्राप्त संसाधन कहाँ खर्च हुए, किस बस्ती का जोखिम कम हुआ, कौन-सी सड़क जलवायु–सहनशील बनी, कितने लोगों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया गया और किन जलागम क्षेत्रों का संरक्षण किया गया—इन सवालों का जवाब भी जनता के सामने होना चाहिए।
नेपाल की जलवायु नीति में लक्ष्यों की कमी नहीं है। राष्ट्रीय अनुकूलन योजना, जलवायु परिवर्तन नीति, राष्ट्रीय निर्धारित योगदान और दीर्घकालीन निम्न–कार्बन विकास रणनीति में कृषि, जलस्रोत, वन, जैव विविधता, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचे और आपदा जोखिम न्यूनीकरण को शामिल किया गया है। लेकिन नीति दस्तावेजों की संख्या बढ़ने और जोखिम घटने के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता। विश्व बैंक भी यह रेखांकित करता रहा है कि नेपाल में जलवायु जोखिम विकास की उपलब्धियों को प्रभावित कर सकता है और अनुकूलन को विकास योजना की मुख्यधारा से जोड़ना आवश्यक है।
सबसे बड़ी चुनौती कार्यान्वयन की है। सड़क बनाते समय भूस्खलन का जोखिम, पुल बनाते समय नदी के बदलते प्रवाह, जलविद्युत परियोजना बनाते समय हिमताल और भूगर्भीय जोखिम, शहर का विस्तार करते समय जलभराव वाले क्षेत्र, बस्ती बसाते समय भौगोलिक जोखिम और कृषि योजना बनाते समय पानी की उपलब्धता को अनिवार्य आधार बनाने की व्यवस्था अभी भी पर्याप्त रूप से संस्थागत नहीं हो पाई है। विकास निर्माण की पारंपरिक व्यवस्था ने ‘बुनियादी ढाँचा निर्माण’ को उपलब्धि माना है, लेकिन अब ‘कितना टिकाऊ और जलवायु–सहनशील बुनियादी ढाँचा बना’ यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि क्षेत्र में और अधिक गंभीर है। मानसून के समय और वर्षा के स्वरूप में बदलाव से किसानों के लिए रोपाई और फसल चक्र का तालमेल कठिन हो रहा है। एक ओर अत्यधिक वर्षा खेतों, पशुधन और भंडारण संरचनाओं को नष्ट कर देती है, वहीं दूसरी ओर लंबे सूखे से उत्पादन घट जाता है। तापमान बढ़ने से कीटों और रोगों का प्रसार, पशुओं पर गर्मी का दबाव तथा पानी की मांग बढ़ने का खतरा भी बढ़ता है। इसलिए जलवायु–अनुकूल कृषि अब कोई वैकल्पिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा की बुनियादी आवश्यकता है।
हिमालय में दिखाई देने वाले बदलाव का प्रभाव तराई तक पहुँचता है। हिमनद और हिमताल नेपाल के जलचक्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के साथ हिमनदों का क्षरण, हिमतालों का विस्तार और हिमताल विस्फोट का खतरा बढ़ सकता है। नेपाल के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान में सन् उन्नीस सौ सत्तर के बाद नेपाल में छब्बीस से अधिक बड़े हिमताल विस्फोट की घटनाओं तथा कम से कम सैंतालीस संभावित जोखिमयुक्त हिमतालों का उल्लेख किया गया है। हिन्दूकुश हिमालय क्षेत्र में सन् दो हजार ग्यारह से दो हजार बीस की अवधि में हिमनद क्षरण पिछले दशक की तुलना में अधिक तेज होने की बात भी इसी दस्तावेज में कही गई है।
इसलिए हिमालय को बचाने का अर्थ केवल हिमालय की सुंदरता को बचाना नहीं है। यह पीने के पानी, सिंचाई, कृषि, जलविद्युत, पर्यटन, जैव विविधता और करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा विषय है। हिमालय में जल स्रोत अस्थिर होने पर उसका प्रभाव निचले क्षेत्रों तक पहुँचता है। इसी कारण नेपाल द्वारा हिमालयी देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के बीच सहयोग की बात उठाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। समुद्र का जलस्तर बढ़ना और हिमालय में हिमनदों का पिघलना एक जैसी प्रक्रियाएँ नहीं हैं, लेकिन दोनों जलवायु परिवर्तन से संवेदनशील समुदायों पर पड़ने वाले असमान जोखिम के उदाहरण हैं।
विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इक्यासीवें सत्र के संदर्भ में जलवायु जोखिम वाले हिमालयी देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया है। नेपाल–बारबाडोस सहयोग को मजबूत करने तथा जलवायु जोखिम वाले देशों की सामूहिक आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावी बनाने की उनकी धारणा नेपाल की कूटनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेपाल के दावे को प्रभावी बनाने के लिए घरेलू तैयारी भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। नेपाल को जलवायु न्याय के नाम पर दुनिया से सहयोग मांगते समय अपने जोखिम के आँकड़े, क्षति के प्रमाण, परियोजनाओं की प्राथमिकता और खर्च की पारदर्शी व्यवस्था प्रस्तुत करने में सक्षम होना होगा। केवल ‘जलवायु प्रभावित देश’ की पहचान पर्याप्त नहीं होगी। जोखिम का वैज्ञानिक अभिलेख, क्षति का मूल्यांकन, परियोजना कार्यान्वयन की क्षमता और परिणाम दिखाने वाली व्यवस्था भी आवश्यक होगी।
जलवायु वित्त का सवाल और अधिक जटिल है। नेपाल को अनुकूलन और बुनियादी ढाँचे को जलवायु–सहनशील बनाने के लिए भारी राशि की जरूरत है। लेकिन यदि विकासशील देश महँगा कर्ज लेकर हर आपदा के बाद पुनर्निर्माण करते रहें तो आपदा और कर्ज का दुष्चक्र पैदा हो सकता है। रसुवा–भोटेकोशी बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण के लिए अनुमानित सात खरब तेईस अरब रुपये से अधिक की आवश्यकता इसका स्पष्ट उदाहरण है। यदि आपदा विकास बजट को नष्ट करती रहे, पुनर्निर्माण के लिए अतिरिक्त कर्ज लेना पड़े और अगली आपदा फिर उसी संरचना को नष्ट कर दे, तो दीर्घकालीन आर्थिक विकास ही खतरे में पड़ सकता है।
इसका समाधान केवल राहत राशि बढ़ाना नहीं है, बल्कि ‘पुनर्निर्माण’ की परिभाषा ही बदलनी होगी। जहाँ नदी का प्रवाह बदल गया है, वहाँ उसी स्थान पर पुराना पुल बना देना पर्याप्त नहीं होगा। जहाँ भूस्खलन का जोखिम संरचनात्मक है, वहाँ सड़क पर फिर से डामर बिछाने से समस्या हल नहीं होगी। जहाँ पूरी बस्ती ही उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में है, वहाँ घर पुनर्निर्माण की सहायता से अधिक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण की नीति आवश्यक हो सकती है। जहाँ जलविद्युत परियोजनाएँ हिमताल या हिमनद से जुड़े जोखिम में हैं, वहाँ परियोजना स्वीकृति के चरण में ही अत्याधुनिक जोखिम मूल्यांकन अनिवार्य किया जाना चाहिए।
सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने की नीति भी अपनाई है। नेपाल के तीसरे राष्ट्रीय निर्धारित योगदान में सन् दो हजार तीस तक नवीकरणीय विद्युत उत्पादन क्षमता चौदह हजार इकतीस मेगावाट और सन् दो हजार पैंतीस तक अट्ठाईस हजार पाँच सौ मेगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। विद्युत वाहन, विद्युत चूल्हे, विद्युत रेल, ऊर्जा दक्षता और वन संरक्षण को भी इन लक्ष्यों में शामिल किया गया है।
नेपाल के संदर्भ में स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार केवल पर्यावरणीय नीति नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर भी है। लेकिन यदि जलविद्युत विस्तार के दौरान जलवायु जोखिम की अनदेखी की गई तो स्वच्छ ऊर्जा पैदा करने वाले यही बुनियादी ढाँचे स्वयं आपदा के जोखिम में पड़ सकते हैं। रसुवा–भोटेकोशी की घटना ने यह सबक दिया है। इसलिए अब ‘ज्यादा मेगावाट’ से अधिक महत्वपूर्ण ‘जलवायु–सुरक्षित मेगावाट’ होना चाहिए।
नेपाल ने वन क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। विश्व बैंक के अनुसार सामुदायिक वन प्रबंधन समेत विभिन्न प्रयासों के माध्यम से नेपाल ने वन क्षेत्र को सन् उन्नीस सौ नब्बे के दशक के लगभग पच्चीस प्रतिशत के आसपास से बढ़ाकर लगभग चवालीस प्रतिशत तक पहुँचाया है। लेकिन वन क्षेत्र का प्रतिशत बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। वन का स्वास्थ्य, जैव विविधता, जलागम संरक्षण, जंगल की आग पर नियंत्रण और स्थानीय समुदाय की आजीविका के साथ वन संरक्षण का संबंध भी मजबूत करना होगा।
अब नेपाल की जलवायु नीति को ‘आपदा के बाद क्षतिपूर्ति’ से ‘आपदा से पहले जोखिम कम करने’ की दिशा में निर्णायक रूप से मोड़ने का समय आ गया है। प्रत्येक स्थानीय सरकार को अपने बाढ़, भूस्खलन, जलभराव, जंगल की आग, सूखा, अत्यधिक गर्मी और हिमताल से जुड़े जोखिम का मानचित्र तैयार कर उसे विकास योजनाओं से जोड़ना चाहिए। विद्यालयों, अस्पतालों, पेयजल परियोजनाओं, सड़कों, पुलों और सरकारी भवनों को जोखिम के आधार पर प्राथमिकता देकर जलवायु–सहनशील बनाना चाहिए। आपदा सूचना प्रणाली को स्थानीय भाषाओं, मोबाइल संदेश, सायरन, सामुदायिक रेडियो और प्रत्यक्ष सामुदायिक परिचालन से जोड़ना चाहिए। जोखिम में रहने वाले परिवारों की पहचान और सुरक्षित स्थानांतरण की योजना आपदा आने से पहले ही तैयार होनी चाहिए।
नेपाल इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर जलवायु परिवर्तन विकास की उपलब्धियों को लगातार पीछे धकेलने का जोखिम पैदा कर रहा है, तो दूसरी ओर इसी संकट को हरित बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु–अनुकूल कृषि, प्रकृति–आधारित समाधान और नए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधन जुटाने के अवसर में बदलने की संभावना भी मौजूद है। इसके लिए भाषण से अधिक तथ्य, घोषणा से अधिक कार्यान्वयन और राहत से अधिक पूर्वतैयारी को प्राथमिकता देनी होगी।
जलवायु न्याय का वास्तविक अर्थ केवल विश्व मंच पर बड़ा भाषण देना नहीं है। इसका अर्थ है जोखिम में रहने वाले नेपाली नागरिकों को समय पर चेतावनी देना, उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना, उनके घर–खेत और आजीविका की रक्षा करना, आपदा के बाद उन पर कर्ज का बोझ न बढ़ने देना और विकास की प्रत्येक परियोजना को भविष्य के जलवायु जोखिम की कसौटी पर परखकर आगे बढ़ाना। नेपाल जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से न्याय की मांग करता है, तब अपने नागरिकों के प्रति राज्य की पहली जिम्मेदारी—सुरक्षा, पूर्वतैयारी और जवाबदेही—भी पूरी करनी होगी।
रसुवा–भोटेकोशी की बाढ़ से बह गई संरचनाएँ फिर से बनाई जा सकती हैं, लेकिन खोई हुई जानें वापस नहीं लाई जा सकतीं। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘अगली आपदा कब आएगी?’ सवाल यह होना चाहिए कि ‘जब अगली आपदा आएगी, तब क्या उससे होने वाला नुकसान आज की तुलना में कम होगा?’
नेपाल यदि जलवायु संकट को विकास से अलग किसी अध्याय के रूप में देखने के बजाय राज्य संचालन और विकास की मुख्यधारा में शामिल करके आगे बढ़ता है, तभी हिमालय से तराई तक का भविष्य सुरक्षित किया जा सकेगा। अन्यथा हर वर्ष नई आपदा समाचार बनेगी, नया राहत पैकेज आएगा, नई पुनर्निर्माण योजना बनेगी—लेकिन संकट के मूल कारण और राज्य की तैयारी के बीच की दूरी वैसी ही बनी रहेगी।





