देवेन्द्रकिशोर ढुंगाना
नेपाल के लोकतांत्रिक अभ्यास का मूल सार समावेशिता, समानुपातिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय है। लेकिन व्यवहार में इन मूल्यों का कितना क्रियान्वयन हुआ है, यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है। विशेष रूप से मधेशी दलित समुदाय का संसद में शून्य प्रतिनिधित्व हमारी राजनीतिक संरचना और सोच पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लगभग ६ प्रतिशत जनसंख्या वाले इस समुदाय का प्रतिनिधित्व न्यूनतम ७ से १७ सदस्यों तक होना चाहिए था, लेकिन शून्य पर सिमट जाना कोई संयोग नहीं, बल्कि संरचनात्मक भेदभाव का स्पष्ट संकेत है।
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल संख्या नहीं, बल्कि आवाज की उपस्थिति है। जब कोई समुदाय संसद में अनुपस्थित होता है, तो इसका अर्थ है कि उसके दुख, समस्याएं और आकांक्षाएं नीति-निर्माण प्रक्रिया से बाहर कर दी जाती हैं। मधेशी दलितों के संदर्भ में यह स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि वे दोहरे—क्षेत्रीय और जातीय—भेदभाव का सामना कर रहे हैं। यह लोकतंत्र के समावेशी चरित्र पर ही प्रश्नचिह्न लगाता है।
दूसरी ओर, एक नेपाली का दूसरे नेपाली के दुख में आवाज उठाना सामाजिक एकता का प्रतीक है। लेकिन विडंबना यह है कि ऐसी सहानुभूति और एकजुटता को भी कुछ लोग जातीय या नस्लीय नजरिए से देखते हैं। यह हमारे समाज में गहराई से जमी संकीर्ण सोच को उजागर करता है। वास्तव में, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना कोई जातीय आग्रह नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। यदि केवल मधेशी दलित ही अपनी बात उठाएं और बाकी लोग मौन रहें, तो यह समावेशी लोकतंत्र नहीं, बल्कि विद्रोह का संकेत होगा।
राजनीतिक दलों की संरचना और कार्यशैली भी इस स्थिति को और जटिल बनाती है। दलों के भीतर का ‘तरमारा वर्ग’—अर्थात सत्ता तक पहुंच रखने वाले सीमित समूह—निर्णय प्रक्रिया पर हावी रहते हैं, जिससे हाशिए के समुदाय पीछे छूट जाते हैं। उम्मीदवार चयन से लेकर नीति निर्माण तक प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व बना रहने से मधेशी दलित जैसे समुदायों की भागीदारी कमजोर हो जाती है। इससे केवल प्रतिनिधित्व का संकट ही नहीं, बल्कि विश्वास का संकट भी पैदा होता है।
इस संदर्भ में ‘नागरिक प्रथम अभियान’ जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं, जो मधेशी दलितों के लिए अलग क्लस्टर और प्रादेशिक मत अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल के २० बिंदुओं वाले नागरिक मांग-पत्र के माध्यम से निरंतर सार्वजनिक पैरवी होना सकारात्मक संकेत है, लेकिन इन मांगों को व्यवहार में लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। केवल कागजी प्रतिबद्धताओं से सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं होता।
मधेश की राजनीति में बढ़ता जातीय टकराव भी एक गंभीर चुनौती है। जब राजनीति जातीय ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती है, तो यह क्षेत्रीय एकता को कमजोर कर देती है। मधेश के भीतर ही विभिन्न जातीय समूहों के बीच अविश्वास साझा मुद्दों को पीछे धकेल देता है। ऐसे में मधेश का प्रतिनिधित्व केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि समावेशी और बहुआयामी होना चाहिए। जातीय क्लस्टर को व्यापक राजनीतिक भावना से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
तो समाधान क्या है? पहला, राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समावेशिता सुनिश्चित करनी होगी। दूसरा, संविधान द्वारा प्रदत्त समानुपातिक प्रतिनिधित्व की भावना को व्यवहार में उतारने के लिए ठोस नीतियां बनानी होंगी। तीसरा, समाज में मौजूद जातीय पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए दीर्घकालिक जागरूकता और शिक्षा आवश्यक है। और चौथा, सभी नेपाली नागरिकों को एक-दूसरे के दुख में साथ देने की संस्कृति विकसित करनी होगी—यह कोई जातीय आग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का आधार है।
अंततः, मधेशी दलितों के प्रतिनिधित्व का सवाल केवल एक समुदाय का मुद्दा नहीं, बल्कि नेपाल के लोकतंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न है। जब तक सभी समुदाय अपने प्रतिनिधित्व और आवाज को संसद में महसूस नहीं करते, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। इसलिए अब चुनौती यह है कि इस शून्यता को पूर्णता में बदला जाए—जहां हर नेपाली स्वयं को राज्य का अभिन्न हिस्सा महसूस कर सके।









