नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो महीनों से जारी तनाव के बीच ८ अप्रैल को युद्धविराम की घोषणा के बाद शांति वार्ता शुरू की गई। यह वार्ता इस्लामाबाद में हुई, जहां अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने करीब २१ घंटे तक बातचीत की, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका।
इसके बावजूद इस बातचीत को पूरी तरह विफल नहीं माना जा रहा है। वार्ता के दौरान शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच अविश्वास था, लेकिन समय के साथ माहौल नरम हुआ और आपसी संवाद बेहतर हुआ। इससे दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ने की बात सामने आई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि बातचीत गहन रही और अंत तक माहौल कुछ हद तक सकारात्मक और दोस्ताना हो गया था। हालांकि, सबसे बड़ा विवाद अभी भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह परमाणु संवर्धन बंद करे, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह इसे बंद नहीं करेगा।
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी की घोषणा को ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। बातचीत के दौरान अमेरिका को यह भी संकेत मिला कि ईरान की वास्तविक स्थिति उतनी मजबूत नहीं हो सकती जितनी वह दिखाता है, जिससे आगे की रणनीति तय करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, भले ही इस दौर की वार्ता में कोई समझौता नहीं हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता खुला है और भविष्य में समझौते की उम्मीद बनी हुई है।









