नंदीग्राम में ममता के पीछे हटने से बंगाल में फिर सियासी हलचल, टीएमसी की ‘नई चाल’ से किसे चुनौती?

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सिलीगुड़ी(देवेंद्र के ढुंगाना): पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर नंदीग्राम केंद्रित हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जिसके बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि नंदीग्राम से खुद ममता बनर्जी चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगी। यह टीएमसी का स्पष्ट निर्णय है।
टीएमसी ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान (डे) और रेजीनगर से रबिउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही पार्टी ने यह संदेश दिया है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम से उपचुनाव नहीं लड़ेंगी। इस फैसले को महज उम्मीदवार चयन के बजाय टीएमसी की बदलती राजनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नंदीग्राम: एक विधानसभा क्षेत्र से कहीं बड़ा राजनीतिक प्रतीक
नंदीग्राम ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा से गहराई से जुड़ा क्षेत्र है। २०२१ के विधानसभा चुनाव में इसी सीट से भाजपा नेता एवं वर्तमान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के हाथों ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद भी नंदीग्राम बंगाल के सत्ता संघर्ष में एक प्रतीकात्मक राजनीतिक मैदान बना हुआ है।
इसलिए अब ममता बनर्जी के नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ने के फैसले ने स्वाभाविक रूप से सवाल खड़ा किया है—क्या टीएमसी नंदीग्राम को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई के बजाय संगठनात्मक चुनावी रणनीति का मैदान बनाना चाहती है?
इसे केवल ममता का ‘पीछे हटना’ मानना जल्दबाजी होगी। इसके बजाय राजनीतिक विश्लेषण में यह माना जा रहा है कि टीएमसी अपनी संगठनात्मक ताकत का परीक्षण करना चाहती है। अगर ममता खुद मैदान में उतरतीं तो उपचुनाव की पूरी बहस ‘ममता बनर्जी बनाम विपक्ष’ पर केंद्रित हो जाती। लेकिन पार्टी उम्मीदवार को आगे करके चुनाव का केंद्र टीएमसी के संगठन, स्थानीय जनाधार और विपक्षी प्रभाव की ओर ले जाने की कोशिश दिखाई देती है।
बागी गुट के दबाव को भी चुनौती
ममता के फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू टीएमसी के भीतर का आंतरिक विवाद है। पार्टी के बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी पर नंदीग्राम से खुद चुनाव लड़ने का सार्वजनिक दबाव बनाया जा रहा था। उनके लिए नंदीग्राम में ममता की उम्मीदवारी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और पार्टी के भीतर अपना प्रभाव फिर से स्थापित करने का अवसर भी हो सकती थी।
लेकिन टीएमसी के आधिकारिक गुट ने उम्मीदवार की घोषणा करते हुए ममता के खुद चुनाव न लड़ने के फैसले को संस्थागत रूप से आगे बढ़ाया है।
इससे बागी गुट के सामने राजनीतिक रूप से दो चुनौतियां खड़ी होती हैं। पहली, ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता को चुनावी हथियार बनाने की उसकी रणनीति तत्काल लागू नहीं हो पाएगी। दूसरी, अब नंदीग्राम के परिणाम को टीएमसी नेतृत्व अपने संगठनात्मक क्षमता के परीक्षण के रूप में पेश कर सकता है।
शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव की परीक्षा का मैदान
नंदीग्राम का उपचुनाव एक और वजह से महत्वपूर्ण है—यह शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक प्रभाव से जुड़ा विधानसभा क्षेत्र है।
२०२१ में ममता बनर्जी को हराकर शुभेंदु ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह मजबूत की थी। इसके बाद नंदीग्राम उनके राजनीतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। अब ममता के मैदान में नहीं होने की स्थिति में टीएमसी नंदीग्राम में कैसा प्रदर्शन करती है, यह सवाल शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव की भी दोबारा परीक्षा करेगा।
अर्थात्, यह उपचुनाव केवल एक खाली सीट भरने का चुनाव नहीं है। इसके परिणाम से टीएमसी की संगठनात्मक ताकत, भाजपा के स्थानीय प्रभाव और नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक पकड़ के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।
दो गुट, एक ही पार्टी का दावा: टीएमसी संकट का एक और अध्याय
उपचुनाव की तैयारी के साथ ही टीएमसी के भीतर गुटबाजी ने राजनीतिक जटिलता बढ़ा दी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक पक्ष और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी पक्ष के बीच पार्टी के नाम और दो फूल वाले चुनाव चिह्न पर अधिकार का विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है।
दोनों पक्ष खुद को वास्तविक टीएमसी होने का दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग दोनों पक्षों की सुनवाई कर चुका है और बागी पक्ष से अतिरिक्त दस्तावेज भी मांगे हैं। लेकिन नामांकन का समय नजदीक आने के बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म नहीं होने से चुनावी माहौल में असमंजस बढ़ गया है।
ऐसी स्थिति में उम्मीदवारों की घोषणा टीएमसी की एक रणनीतिक राजनीतिक संदेश भी हो सकती है—पार्टी के भीतर विवाद के बावजूद चुनावी मैदान में उसका संगठन सक्रिय है और निर्णय लेने की क्षमता बरकरार है, यह दिखाने का प्रयास।
रेजीनगर में भी संगठन की परीक्षा
रेजीनगर से रबिउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाकर टीएमसी ने नंदीग्राम के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश की है। नंदीग्राम का चुनाव अधिक प्रतीकात्मक और उच्च राजनीतिक तापमान वाला होने की संभावना है, वहीं रेजीनगर का परिणाम यह संकेत दे सकता है कि टीएमसी का पारंपरिक सामाजिक और संगठनात्मक आधार कितना मजबूत है।
अगर दोनों उपचुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहता है तो विपक्ष इसे टीएमसी के आंतरिक संकट से जोड़कर पेश कर सकता है। लेकिन अगर टीएमसी अच्छा प्रदर्शन करती है तो ममता के नेतृत्व में संगठन अब भी प्रभावी है, यह संदेश देने का अवसर पार्टी को मिलेगा।
ममता की रणनीति: व्यक्तिगत लड़ाई से संगठनात्मक लड़ाई की ओर?
ममता बनर्जी के नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ने के फैसले का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ यही हो सकता है। उन्होंने अपने राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा के लिए खुद मैदान में उतरने के बजाय पार्टी संगठन को आगे किया है।
खासकर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में ममता के खुद उम्मीदवार बनने पर विपक्ष के लिए ‘ममता की हार-जीत’ की कहानी बनाना आसान होता। लेकिन पार्टी उम्मीदवार के जरिए चुनाव लड़ने पर टीएमसी इसे स्थानीय जनमत और संगठन की परीक्षा के रूप में पेश कर सकती है।
हालांकि, इस रणनीति में जोखिम भी उतना ही है। अगर टीएमसी कमजोर साबित होती है तो विपक्ष यह राजनीतिक आख्यान बना सकता है कि ‘ममता नंदीग्राम में मैदान में उतरने से डर गईं।’ इसलिए ममता की अनुपस्थिति टीएमसी के लिए रणनीतिक अवसर भी है और राजनीतिक जोखिम भी।
६ अक्टूबर का मतदान देगा संकेत
नंदीग्राम और रेजीनगर में ६ अक्टूबर को मतदान तथा ९ अक्टूबर को मतगणना निर्धारित है। उससे पहले पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद समाप्त होता है या और जटिल बनता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल एक बात स्पष्ट है- नंदीग्राम में ममता बनर्जी खुद मैदान में नहीं होंगी, लेकिन नंदीग्राम की राजनीति से ममता अलग नहीं होंगी।
बल्कि यह उपचुनाव ममता बनर्जी के लिए बिना प्रत्यक्ष उम्मीदवार बने उनके राजनीतिक प्रभाव, पार्टी संगठन और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा बनेगा। वहीं विपक्ष के लिए नंदीग्राम में टीएमसी को कमजोर करने का अवसर होगा।
इसलिए नंदीग्राम के आगामी उपचुनाव को केवल दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबले के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह ममता बनर्जी के नेतृत्व, शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव, टीएमसी के भीतर गुटबाजी और पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच बहुआयामी शक्ति परीक्षण बनने के संकेत दे रहा है।
नंदीग्राम में ममता नहीं हैं, लेकिन ममता की राजनीतिक छाया मौजूद है और यही वजह है कि बंगाल का यह उपचुनाव एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति की नजरों में आ गया है।

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