१९४५ की विजय से २०२६ की दुनिया तक—शक्ति, युद्ध और शांति का अधूरा सबक
देवेन्द्र के. ढुंगाना
२ सितंबर १९४५को अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस मिसौरी पर जापान ने औपचारिक आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध का अंतिम अध्याय बंद हुआ। इससे पहले १५ अगस्त को सम्राट हिरोहितो ने रेडियो के माध्यम से जापान के आत्मसमर्पण की घोषणा कर दी थी। इसलिए १५ अगस्त और २ सितंबर—दोनों को अलग-अलग संदर्भों में भी-जे डे (विक्ट्री ओवर जापान डे) के रूप में स्मरण किया जाता है।
लेकिन आठ दशक बाद यह प्रश्न और भी गंभीर होकर सामने खड़ा है—क्या वी-जे डे वास्तव में विजय का दिन था, या वह दिन जब मानवजाति युद्ध से सीखने वाले सबक को भूलने लगी?
१९४५ में मित्र राष्ट्रों की सड़कों पर उत्सव था। लंदन, वॉशिंगटन और अन्य शहरों में लोग नाचे, गीत गाए और आतिशबाज़ी की। छह वर्षों से चला आ रहा युद्ध समाप्त हो गया था। लेकिन उसी क्षण दुनिया के दूसरे भूगोल में विजय का कोई उत्सव नहीं था। हिरोशिमा और नागासाकी के खंडहरों में लोग मृत्यु, विकिरण और पीड़ा से जूझ रहे थे। एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लाखों नागरिक युद्ध, कब्ज़े, अकाल, विस्थापन और हिंसा के घाव लेकर जीवन जीने के संघर्ष में थे।
इस अर्थ में वी-जे डे इतिहास का एक असहज विरोधाभास है—किसी के लिए विजय, किसी के लिए विनाश; किसी के लिए स्वतंत्रता का उत्सव, तो किसी के लिए जीवनभर न भरने वाला घाव।
परमाणु विजय का नैतिक प्रश्न
हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया जाना द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत से जुड़ा सबसे विवादास्पद ऐतिहासिक विषय है। अमेरिकी दृष्टिकोण से यह तर्क दिया जाता है कि इससे जापान को शीघ्र आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने और संभावित लंबे जमीनी युद्ध से होने वाली अतिरिक्त क्षति को रोकने में भूमिका निभाई। दूसरी ओर, आलोचक सवाल उठाते हैं—नागरिक आबादी के बड़े हिस्से को तत्काल और दीर्घकालीन विनाश की ओर धकेलने वाले हथियार के इस्तेमाल को ‘विजय’ की भाषा में कैसे समझाया जा सकता है?
इतिहास का मूल्यांकन करते समय भावनाओं के बजाय तथ्यों और बहस की आवश्यकता होती है। जापान पर परमाणु बम के प्रभाव के साथ-साथ सोवियत संघ का जापान के खिलाफ युद्ध में प्रवेश, जापानी सैन्य नेतृत्व के भीतर पैदा हुआ संकट और लंबे युद्ध के संभावित परिणामों को भी समग्र रूप से देखना चाहिए। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—१९४५ ने मानवजाति को ऐसे हथियार की शक्ति दिखाई, जो युद्ध में विजय और मानव सभ्यता के अस्तित्व के बीच की सीमा को ही मिटा सकता है।
आज भी दुनिया में हजारों परमाणु हथियार मौजूद हैं। इसलिए हिरोशिमा और नागासाकी केवल इतिहास नहीं हैं; वे भविष्य के लिए चेतावनी हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी दुनिया किधर गई?
युद्ध के बाद दुनिया ने संकल्प लिया—‘अब फिर ऐसा युद्ध नहीं होना चाहिए।’ संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। अंतरराष्ट्रीय कानून और सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा विकसित हुई। युद्ध अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने का प्रयास किया गया। जापान स्वयं सैन्यवाद से लोकतंत्र और आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ा।
लेकिन इसके साथ एक दूसरी वास्तविकता भी जन्मी—शक्ति की राजनीति ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय नैतिकता को पीछे धकेल दिया।
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिस्पर्धा ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। परमाणु हथियारों की दौड़ तेज हुई। कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान से लेकर मध्यपूर्व और अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों तक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने युद्ध को नए रूप दिए।
अर्थात् १९४५ में विश्वयुद्ध समाप्त हुआ, लेकिन शक्ति–राजनीति का युद्ध समाप्त नहीं हुआ।
आज की दुनिया: क्या इतिहास दोहराया जा रहा है?
आज यूरोप में युद्ध जारी है। मध्यपूर्व में हिंसा और मानवीय संकट जारी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में क्षेत्रीय शक्तियों और महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। ड्रोन, मिसाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर तकनीक और परमाणु हथियारों ने युद्ध को पहले से कहीं अधिक तीव्र और विनाशकारी बना दिया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्र शांति की भाषा बोलते हुए समानांतर रूप से अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। हथियार उद्योग विश्व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। युद्ध अब केवल राजनीतिक निर्णय नहीं रहा; कई मामलों में यह आर्थिक, औद्योगिक और रणनीतिक हितों से भी जुड़ गया है।
यहीं से वी-जे डे का वास्तविक समकालीन प्रश्न शुरू होता है।
क्या दुनिया ने १९४५ से वास्तव में कुछ सीखा?
यदि सीखा था, तो परमाणु हथियारों का अस्तित्व आज भी मानव सुरक्षा के नाम पर स्वीकार्य क्यों है? यदि अंतरराष्ट्रीय कानून सर्वोच्च है, तो शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए उसके मानदंड अलग क्यों दिखाई देते हैं? यदि संयुक्त राष्ट्र विश्व शांति की संस्था है, तो सुरक्षा परिषद की शक्ति-संरचना आज भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की भू-राजनीतिक स्थिति पर क्यों टिकी हुई है?
ये प्रश्न असहज हैं, लेकिन शांति के भविष्य के लिए आवश्यक हैं।
युद्ध में कौन जीतता है?
युद्ध में कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को पराजित कर सकता है। भूभाग पर कब्ज़ा कर सकता है। सरकार बदल सकता है। सैन्य विजय हासिल कर सकता है। लेकिन युद्ध के बाद आने वाली पीढ़ियों के मानसिक आघात, नष्ट हुए बुनियादी ढाँचे, विस्थापन, गरीबी और सामाजिक विखंडन को कौन जीतता है?
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान ने पुनर्निर्माण किया। जर्मनी का पुनर्निर्माण हुआ। यूरोप ने नए सहयोग का रास्ता चुना। लेकिन दुनिया युद्ध की मूल संरचना—हथियारों की प्रतिस्पर्धा, शक्ति-संतुलन की राजनीति और ‘सुरक्षा’ के नाम पर सैन्य प्रभुत्व—को पूरी तरह त्याग नहीं सकी।
इसलिए आज वी-जे डे मनाते समय केवल ‘हमने युद्ध जीत लिया’ कहना पर्याप्त नहीं है। प्रश्न होना चाहिए—हमने युद्ध से क्या सीखा?
नेपाल के लिए भी इसका अर्थ है
नेपाल विश्वशक्ति नहीं है, लेकिन विश्वशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से अलग भी नहीं है। विदेशी रोज़गार, व्यापार, ऊर्जा, बुनियादी ढाँचा, कूटनीति, सुरक्षा और विकास के क्षेत्रों में बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन का प्रभाव नेपाल पर पड़ता है।
नेपाल जैसे देश के लिए वी-जे डे का सबक और भी स्पष्ट है—शक्तिशाली राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा में किसी एक पक्ष का अंध समर्थन करने के बजाय राष्ट्रीय हित, संप्रभुता, गुटनिरपेक्षता, कूटनीतिक संतुलन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व अधिक महत्वपूर्ण हैं।
नेपाल को विश्वशक्तियों की सैन्य प्रतिस्पर्धा का मैदान बनने के बजाय संवाद, बहुपक्षवाद और शांति के पक्ष में अपनी कूटनीतिक आवाज़ को मजबूत करना चाहिए।
विजय की नई परिभाषा आवश्यक है
१९४५में विजय का अर्थ था—शत्रु का आत्मसमर्पण। आज मानव सभ्यता के लिए विजय का अर्थ बदलना चाहिए।
विजय वह नहीं है, जहाँ दूसरा राष्ट्र पराजित हो। विजय वह है, जहाँ युद्ध शुरू करने की आवश्यकता ही न पड़े।
विजय वह नहीं है, जहाँ शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर पर अपनी इच्छा थोपे। विजय वह है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून शक्ति से ऊपर हो।
विजय वह नहीं है, जहाँ परमाणु हथियार ‘सुरक्षा’ प्रदान करें। विजय वह है, जहाँ मानव जीवन स्वयं सुरक्षा का सबसे बड़ा मानक बने।
वी-जे डे इसलिए इतिहास की केवल एक तारीख नहीं है—यह मानव विवेक की परीक्षा है।

१९४५ में युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन युद्ध की संभावना समाप्त नहीं हुई। यदि आज की दुनिया फिर उसी रास्ते पर लौट रही है, तो वी-जे डे का स्मरण केवल औपचारिक समारोहों तक सीमित करना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
हमें १९४५ की विजय को याद करना चाहिए, लेकिन उसके साथ हिरोशिमा की राख, नागासाकी के पीड़ितों, युद्ध में मारे गए सैनिकों और नागरिकों, विस्थापित परिवारों तथा अनगिनत अनाम पीड़ितों को भी याद करना चाहिए।
क्योंकि इतिहास का सबसे कठोर सत्य यही है-
युद्ध के मैदान में विजेता घोषित किया जा सकता है; लेकिन युद्ध की मानवीय कीमत में कोई विजेता नहीं होता।
और यदि द्वितीय विश्वयुद्ध ने मानवजाति को कोई अंतिम चेतावनी दी थी, तो वह यही है-
शांति कमजोरी नहीं, बल्कि सभ्यता की सर्वोच्च राजनीतिक बुद्धिमत्ता है।





