मणिपाल हॉस्पिटल्स का ‘शुरुआत घर से’ अभियान
कोलकाता: पूंजीवादी स्वास्थ्य तंत्र में जहां जीवन बचाना भी एक महंगी वस्तु बना दिया गया है, वहीं अंगों के अभाव में तड़पते सर्वहारा वर्ग और आम जनता के लिए अंगदान का मुद्दा एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनकर उभरा है। इस कॉरपोरेट-संचालित व्यवस्था के बीच ‘विश्व अंगदान दिवस’ के अवसर पर मणिपाल हॉस्पिटल्स कोलकाता ने ‘शुरुआत घर से’ नामक एक जन-जागरूकता अभियान की घोषणा की है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बुर्जुआ सामाजिक रूढ़ियों और भ्रांतियों को तोड़ते हुए पारिवारिक स्तर पर अंगदान की चेतना को जगाना और इसे एक जन-आंदोलन का रूप देना है।
अंगदान का वर्गीय अंतर और आंकड़ों का सच
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के आंकड़े कॉरपोरेट स्वास्थ्य ढांचे की विफलता और जन-सामान्य के जीवन संकट को उजागर करते हैं। भारत में जहां वर्ष २०२५ में कुल २०,०१९ अंग प्रत्यारोपण हुए, वहीं ३ मार्च २०२६ तक ८९,८३९ से अधिक मजदूर, किसान और आम नागरिक अंगों की प्रतीक्षा सूची में जीवन और मृत्यु से जूझ रहे थे।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश में केवल १८ प्रतिशत प्रत्यारोपण ही मृत दाताओं से प्राप्त अंगों के माध्यम से हो पाते हैं। निजी अस्पतालों के भारी-भरकम खर्च और जागरूकता की कमी के कारण अंगों का यह संकट गरीब और शोषित वर्ग के लिए और भी जानलेवा बन जाता है।
व्यक्तिगत त्याग और वर्ग-संवेदना की मिसाल
इस अवसर पर बेंगलुरु के मणिपाल अस्पताल की डॉक्टर थैंकम एस. ने अपने असाधारण त्याग से एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने किसी पारिवारिक संबंध के बिना एक ५६ वर्षीय पीड़ित महिला सुरेखा यू. को अपना एक गुर्दा दान कर उन्हें नया जीवन दिया।
अपने संघर्ष को साझा करते हुए डॉ. थैंकम ने कहा, “यह लड़ाई केवल चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि रूढ़िवादी सोच और डर के खिलाफ एक सामाजिक चेतना की लड़ाई है। भारत में मृत अंगदान की दर दुनिया में सबसे कम है। जब तक हम अपने घरों से अंधविश्वास और भ्रम को खत्म करके खुले संवाद की शुरुआत नहीं करेंगे, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी। अंगदान किसी कॉरपोरेट तंत्र का हिस्सा नहीं, बल्कि मानवता के प्रति एक क्रांतिकारी संकल्प है।”
अस्पताल परिसर में कियोस्क और विशेषज्ञों की सहभागिता
अभियान के तहत मणिपाल हॉस्पिटल्स ईस्ट के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अयानाभ देबगुप्ता, डॉ. शुगोता चक्रवर्ती, डॉ. दिलीप पहाड़ी और डॉ. उपल सेनगुप्ता सहित कई ट्रांसप्लांट विशेषज्ञों ने भाग लिया। अस्पताल परिसर में आम जनता, कर्मचारियों और मरीजों को अंगदान का संकल्प दिलाने के लिए एक समर्पित ‘अंगदान कियोस्क’ की भी स्थापना की गई।
कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अंगदान केवल किसी की मृत्यु से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह शोषित और पीड़ित इंसान को फिर से उत्पादक जीवन, काम का अधिकार और परिवार के साथ जीने का अवसर देने की एक मानवीय प्रक्रिया है। मणिपाल हॉस्पिटल्स ने इसे महज एक औपचारिक आयोजन न मानकर पूंजीवादी रूढ़िवादिता के खिलाफ निरंतर चलने वाला जागरूकता अभियान बनाने का संकल्प लिया है।










