जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का पूरा गणित
नई दिल्ली: दुनिया के नक्शे पर किसी नए देश का उभरना सिर्फ एक भौगोलिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बेहद जटिल कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक प्रक्रिया है। वर्ष २०११ में दक्षिण सूडान के गठन के बाद से दुनिया ने किसी नए संप्रभु देश को आधिकारिक रूप से वैश्विक नक्शे पर जुड़ते नहीं देखा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि कोई क्षेत्र खुद को आजाद घोषित कर दे, तो उसे देश का दर्जा कौन देता है और इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया क्या है।
अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी क्षेत्र को ‘देश’ मानने के लिए एक बुनियादी पैमाना तय है। वर्ष १९३३ में हुए मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुच्छेद १ के तहत किसी भी नए देश के पास चार बुनियादी योग्यताएं होनी अनिवार्य हैं। इसके तहत पहली शर्त यह है कि वहां रहने वाले लोगों की एक निश्चित और स्थायी जनसंख्या होनी चाहिए। दूसरी आवश्यकता एक निश्चित सीमा या भूभाग की है, यानी एक ऐसा तय इलाका हो जिसकी सीमाएं स्पष्ट हों, भले ही पड़ोसी देशों के साथ उसका सीमा विवाद क्यों न चल रहा हो। तीसरा पैमाना एक प्रभावी सरकार का है, जिसके तहत एक ऐसी शासन प्रणाली या सरकार हो जो उस क्षेत्र के आंतरिक और बाहरी मामलों को संभालने में पूरी तरह सक्षम हो। चौथी योग्यता यह है कि वह क्षेत्र दूसरे देशों के साथ संधियां, व्यापार और राजनयिक संबंध बनाने की कानूनी क्षमता रखता हो।
आमतौर पर यह माना जाता है कि संयुक्त राष्ट्र (यूएन) किसी नए देश को मान्यता देता है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। संयुक्त राष्ट्र खुद कोई देश या सरकार नहीं है, इसलिए वह किसी देश को मान्यता नहीं दे सकता। नए देश को मान्यता देने का अधिकार केवल दुनिया के अन्य संप्रभु देशों के पास होता है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलना किसी भी नए देश के लिए अंतिम और सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जाती है, जिसकी प्रक्रिया बेहद कठिन है।
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सबसे पहले नए देश को सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के १५ सदस्यों में से कम से कम ९ सदस्यों का समर्थन हासिल करना होता है। इसमें सबसे बड़ा पेंच यह है कि पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) में से कोई भी इसके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल न करे। सुरक्षा परिषद से हरी झंडी मिलने के बाद यह मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में जाता है, जहां दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। यानी संयुक्त राष्ट्र के १९३ सदस्य देशों में से कम से कम १२९ देशों द्वारा प्रस्ताव पास होना जरूरी है।
नए देश के निर्माण और उसकी मान्यता को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों में दो तरह के सिद्धांत प्रचलित हैं। पहला घोषणात्मक सिद्धांत कहता है कि यदि कोई क्षेत्र मोंटेवीडियो कन्वेंशन की चारों शर्तों को पूरा करता है, तो वह अपने आप में एक देश है, भले ही दूसरे देश उसे स्वीकार करें या न करें। ताइवान और सोमालीलैंड इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिनके पास अपनी सेना, पासपोर्ट और सरकार है, लेकिन वैश्विक मंच पर इन्हें व्यापक मान्यता नहीं मिली है। दूसरी ओर, रचनात्मक सिद्धांत (कॉन्स्टिट्यूटिव थ्योरी) के अनुसार कोई भी क्षेत्र तब तक देश नहीं बन सकता जब तक कि दुनिया के अन्य प्रमुख संप्रभु देश उसे आधिकारिक मान्यता न दे दें।
इतिहास गवाह है कि जब तक कोई मूल देश स्वेच्छा से अपने किसी हिस्से को अलग होने की अनुमति न दे (जैसे सूडान ने दक्षिण सूडान को दी थी), तब तक दुनिया के देश उस नए क्षेत्र को मान्यता देने से बचते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की संप्रभुता का उल्लंघन न हो। दुनिया के नक्शे पर एक लकीर खींच देना बेहद आसान है, लेकिन उस लकीर को दुनिया से संप्रभुता की मान्यता दिलाना सबसे कठिन काम है। मोंटेवीडियो के नियम जितने कानूनी हैं, नए देश का उदय उससे कहीं ज्यादा वैश्विक राजनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों पर निर्भर करता है। जब तक महाशक्तियों के हित और अंतरराष्ट्रीय सर्वसम्मति किसी नए क्षेत्र के पक्ष में न हो, तब तक कोई भी आंदोलन केवल इतिहास के पन्नों में एक अधूरा संघर्ष बनकर रह जाता है।










