संपत्ति जांच पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

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भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम या क्षेत्राधिकार का टकराव?

काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली): नेपाल में उच्च पदों पर आसीन और सेवानिवृत्त सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच करने की सरकारी कोशिशों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है। इस फैसले ने जहां एक ओर कानूनी क्षेत्राधिकार और शक्ति पृथक्करण की जटिल बहस को हवा दे दी है, वहीं दूसरी ओर सुशासन की आस लगाए बैठी आम जनता में भारी निराशा और आक्रोश भी पैदा किया है।
​न्यायाधीश नृपध्वज निरौला की एकल पीठ द्वारा बुधवार को जारी अंतरिम आदेश ने संपत्ति जांच आयोग की पूरी प्रक्रिया को फिलहाल ठप कर दिया है। मणिराम उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ किया कि वर्तमान और सेवानिवृत्त सभी सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच तत्काल रोकी जाए। इससे पहले पिछले शुक्रवार को अदालत के एक आदेश में अस्पष्टता का लाभ उठाते हुए आयोग ने पूर्व जजों और पूर्व सैनिकों को छोड़कर बाकी अधिकारियों की जांच जारी रखने की अधिसूचना जारी की थी। लेकिन, बुधवार के नए फैसले ने उस व्याख्या को खारिज करते हुए जांच प्रक्रिया को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया है।
​इस पूरे विवाद के केंद्र में शक्ति पृथक्करण (सेपरेशन ऑफ पावर्स) का सिद्धांत और क्षेत्राधिकार का सवाल है। याचिकाकर्ता और कानूनविदों का तर्क है कि वर्तमान या सेवानिवृत्त जजों और सैन्य अधिकारियों की जांच के लिए संविधान में विशेष संस्थागत व्यवस्थाएं की गई हैं। ऐसे में कार्यपालिका के अधीन गठित किसी सामान्य आयोग द्वारा सीधे न्यायपालिका या सेना के मामलों में हस्तक्षेप करना संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है। हालांकि, दूसरी तरफ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के कानूनी दांवपेच अक्सर उच्च पदों पर बैठे लोगों को जवाबदेही से बचाने का एक सुरक्षित रास्ता बन जाते हैं।
​इस अदालती आदेश ने नेपाली राजनीति और समाज में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जहां सरकार पर अपने करीबी मंत्रियों और सांसदों को बचाने तथा विरोधियों को निशाना बनाने के लिए इस आयोग का इस्तेमाल करने के आरोप लग रहे थे, वहीं अदालत के इस फैसले को आम जनता ने न्यायपालिका की तटस्थता के रूप में स्वीकार नहीं किया है। सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं और सोशल मीडिया पर दिख रहा गुस्सा इस बात का गवाह है कि लोग इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ा झटका मान रहे हैं। कानूनी बारीकियों और तकनीकी उलझनों के कारण जब भी बड़े मामलों में जांच रुकती है, तो इससे समाज में यह संदेश जाता है कि रसूखदार लोग हमेशा कानून की पहुंच से दूर रहेंगे।

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