​कांग्रेस और टीएमसी के विलय की चर्चा: राजनीतिक विश्लेषकों के दृष्टिकोण और समीकरण

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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में विपक्षी दलों के लिए राह कभी भी आसान नहीं रही है। साल १९७७ में सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस और २०११ में सत्ता गंवाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) आज तक खुद को संभाल नहीं पाई हैं। इसी कड़ी में, इस वर्ष तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी सत्ता से बाहर हो गई है और पार्टी अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। ममता बनर्जी की पार्टी के कई विधायक और सांसद उनसे अलग हो चुके हैं, यहाँ तक कि विधानसभा में बागी गुट ने अपना अलग नेता प्रतिपक्ष भी चुन लिया है। दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से २० बागी हो गए हैं। इस बड़े संकट के बीच ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं क्रमशः सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की है। इन मुलाकातों के बाद भारतीय मीडिया में टीएमसी के कांग्रेस में विलय की अटकलें तेज हो गईं, हालांकि दोनों ही पार्टियों ने आधिकारिक तौर पर इससे इनकार किया है।
​कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने स्पष्ट किया है कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच हुई मुलाकात पूरी तरह से सौहार्दपूर्ण थी और यह उनके लंबे व्यक्तिगत व राजनीतिक संबंधों पर आधारित थी, इसलिए विलय के दावे पूरी तरह गलत हैं। दूसरी ओर, बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी औपचारिक प्रस्ताव की जानकारी नहीं है, लेकिन उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राजनीतिक झटकों के बाद अब टीएमसी का रवैया बदला हुआ दिखाई दे रहा है। इतने वर्षों तक जिन्हें कांग्रेस नेताओं से मिलने की जरूरत नहीं थी, वे अब खुद आगे आ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार सायंतन घोष का मानना है कि बंगाल की राजनीति कभी सीधी रेखा में नहीं चलती और आने वाले दिनों में बंगाल कांग्रेस में बड़े पैमाने पर दल-बदल देखने को मिल सकता है।
​वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी के अनुसार, यदि कांग्रेस और टीएमसी का विलय होता है, तो इससे टीएमसी को राज्य की अव्यवस्था से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिल सकती है, और कांग्रेस को टीएमसी के बड़े वोट बैंक तक पहुंच मिल जाएगी। हालांकि, यह अधीर रंजन चौधरी के लिए अच्छी खबर नहीं होगी और वाम दल भी इसे पसंद नहीं करेंगे, जो टीएमसी के कमजोर होने के बाद विपक्ष की खाली जगह को भरने की उम्मीद लगाए बैठे थे। इसके विपरीत, वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी इस विलय के विचार को पूरी तरह बेकार मानते हैं। उनका कहना है कि ममता बनर्जी आज जितनी अलोकप्रिय हैं, शायद पहले कभी नहीं थीं, इसलिए कांग्रेस को उनकी अलोकप्रियता का बोझ अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जो नेता हमेशा खुद शक्ति का केंद्र रही हो, वह स्वेच्छा से कांग्रेस आलाकमान का अनुशासन कैसे स्वीकार कर सकती हैं।
​ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो १९९३ में यूथ कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने वामदलों के प्रति कांग्रेस के कथित नरम रुख के खिलाफ बगावत की थी, जिसके बाद उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जिसने धीरे-धीरे बंगाल से कांग्रेस का आधार खत्म कर दिया। साल २०११ में कांग्रेस ने जूनियर पार्टनर के रूप में ममता के साथ गठबंधन किया था, लेकिन बाद में यह साझेदारी भी टूट गई। साल २०२१ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामपंथ का गठबंधन शून्य पर सिमट गया था। अब, इस वर्ष सत्ता से बाहर होने के बाद टीएमसी में जारी टूट और कांग्रेस के साथ विलय की इस नई चर्चा ने देश और विशेषकर बंगाल की राजनीति को एक दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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