निर्वाचन प्रणाली में सुधार या पश्चगमन?

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एक जिला एक निर्वाचन क्षेत्र’ के प्रस्ताव पर राजनीतिक और अकादमिक हलकों में असंतोष

​काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली): नेपाल के निर्वाचन आयोग द्वारा प्रत्येक जिले को केवल एक निर्वाचन क्षेत्र बनाने के उद्देश्य से संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद देश के राजनीतिक और अकादमिक हलकों में एक नई बहस और असंतोष का माहौल बन गया है। आयोग का तर्क है कि देश पर वित्तीय बोझ को कम करने और संसद को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए संविधान संशोधन कार्यदल को यह सुझाव दिया गया है, लेकिन इसके व्यावहारिक और संवैधानिक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार प्रतिनिधि सभा में २७५ सांसद होने का प्रावधान है, जबकि आयोग ने प्रत्यक्ष प्रणाली के तहत ७७ जिलों से केवल ७७ सांसद रखने और राष्ट्रीय सभा के सदस्यों की संख्या भी घटाने का प्रस्ताव किया है। इसके अलावा, उम्मीदवारों की आयु सीमा २५ से घटाकर २१ वर्ष करने तथा खुद निर्वाचन आयोग के आयुक्तों की संख्या में कटौती करने जैसे सुझाव भी दिए गए हैं।
​हालांकि, विशेषज्ञों ने आयोग के इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए इसे अपर्याप्त अध्ययन और व्यावहारिक सोच से परे बताया है। संघवाद के विशेषज्ञ प्रोफेसर पीतांबर शर्मा के अनुसार, वर्तमान समय में जब तराई और शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और पहाड़ी जिलों में आबादी घट रही है, ऐसे में सभी जिलों को एक ही तराजू में तौलना न्यायसंगत नहीं है। मनांग या मुस्तांग जैसे कम आबादी वाले जिलों और काठमांडू या मोरंग जैसे लाखों की आबादी वाले जिलों को एक समान अधिकार देने से जनसांख्यिकीय प्रतिनिधित्व का सिद्धांत ही ध्वस्त हो जाएगा। आयोग ने वित्तीय बोझ कम करने के लिए पंचायत काल के पुराने फॉर्मूले का हवाला दिया है, लेकिन यह कदम संविधान के मूल स्तंभ माने जाने वाले आनुपातिक और समावेशी प्रतिनिधित्व की भावना को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आर्थिक बोझ ही कम करना है, तो ७५३ स्थानीय निकायों (पालिकाओं) की संख्या घटाकर लगभग ५०० करना अधिक तर्कसंगत होगा।
​राजनीतिक स्तर पर भी मुख्य विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति और संदेह व्यक्त किया है। नेपाली कांग्रेस के सचेतक निष्कल राई ने दावा किया है कि यह प्रस्ताव संविधान की धारा ८४ द्वारा निर्दिष्ट जनसंख्या, भौगोलिक अनुकूलता और विशिष्टता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। वहीं, एक अन्य विपक्षी दल नेकपा एमाले की संसदीय दल की उपनेता पद्मा अर्याल ने टिप्पणी की है कि बिना किसी गहन अध्ययन और तैयारी के लाया गया यह प्रस्ताव पूरी तरह से व्यावहारिक और असंतुलित है। हालांकि दोनों दलों ने इस मुद्दे पर अभी तक अपनी आधिकारिक नीति तय नहीं की है, लेकिन वे इस बात पर एकमत हैं कि सांसदों की संख्या घटाने के नाम पर देश की सामाजिक और भौगोलिक विविधता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। कुल मिलाकर, निर्वाचन आयोग द्वारा प्रस्तावित इस सुधार कदम की चौतरफा आलोचना हो रही है, क्योंकि विशेषज्ञों और राजनेताओं का मानना है कि इससे संसद में जन प्रतिनिधित्व संकुचित होगा और लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचेगी।

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