ऊर्जा संकट के बीच जापान का नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार पर जोर

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टोक्यो: जापान सरकार ने बढ़ती ऊर्जा कीमतों और मध्यपूर्व में जारी तनाव के प्रभावों से निपटने के लिए ३.११ ट्रिलियन येन (लगभग १९.५ अरब अमेरिकी डॉलर) के अतिरिक्त बजट के प्रारंभिक मसौदे को मंजूरी दे दी है।
मंत्रिमंडल ने बुधवार को इस बजट को पारित किया। इसे संसद द्वारा शुक्रवार तक अनुमोदित किए जाने की उम्मीद है।
विश्लेषकों का कहना है कि सरकारी व्यय में वृद्धि से आर्थिक चुनौतियों और मुद्रास्फीति संबंधी चिंताएँ बढ़ सकती हैं, क्योंकि चालू वित्तीय वर्ष शुरू होने के केवल दो महीने के भीतर ही अतिरिक्त बजट प्रस्तुत किया गया है।
नए बजट के तहत २.५ ट्रिलियन येन का एक आपातकालीन कोष स्थापित किया जाएगा, जिसका मुख्य उद्देश्य ऊर्जा कीमतों में हुई तीव्र वृद्धि को नियंत्रित करना और पेट्रोलियम सब्सिडी को जारी रखना है। सरकार मार्च से ही खुदरा पेट्रोल की कीमत को लगभग १७० येन प्रति लीटर पर सीमित रखने के लिए तेल वितरकों को सब्सिडी प्रदान कर रही है।
इसके लिए वित्तीय वर्ष २०२५ के आपातकालीन कोष से लगभग ८०० अरब येन का उपयोग किया जा चुका है। अधिकारियों के अनुसार, इस कोष की शेष राशि तेजी से घट रही है और आने वाले महीनों में इसके समाप्त होने का जोखिम है।
अतिरिक्त बजट के अंतर्गत जुलाई से सितंबर तक घरेलू उपभोक्ताओं को ऊर्जा व्यय में राहत देने के लिए ५१३.५ अरब येन आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा, स्थानीय प्रशासन को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उपयोग करने हेतु १०० अरब येन भी प्रदान किए जाएंगे। इस राशि का उपयोग तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) तथा उच्च वोल्टेज बिजली का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं और व्यवसायों को सहायता देने के लिए किया जाएगा।
जापान मध्यपूर्व से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है, इसलिए वहां की अस्थिरता का उसकी ऊर्जा आपूर्ति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है। इसी कारण मूल्य नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार पर अतिरिक्त बजट लाने का दबाव बढ़ता जा रहा था।
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसिडि) की हालिया आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर धीमी रहने की संभावना है। वर्ष २०२५ में वैश्विक आर्थिक वृद्धि लगभग 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि २०२६ में यह घटकर २.८ प्रतिशत रह सकती है। इसके बाद २०२६ में वैश्विक अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार होने और वृद्धि दर ३.१ प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। यह अनुमान संकेत देता है कि विश्व अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक दबावों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन दीर्घकाल में क्रमिक सुधार संभव है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष २०२६ की शुरुआत में वैश्विक अर्थव्यवस्था अपेक्षा से कुछ अधिक मजबूत दिखाई दी, लेकिन मध्यपूर्व में जारी तनाव और संघर्ष वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को प्रमुख रूप से प्रभावित कर रहे हैं। इन संघर्षों का ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाओं, निवेश माहौल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ रहा है, जिससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
ओइसिडि ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए दो संभावित परिदृश्यों का विश्लेषण किया है। पहले परिदृश्य में संघर्षों से उत्पन्न व्यवधान सीमित अवधि तक रहते हैं और ऊर्जा तथा आपूर्ति प्रणालियाँ शीघ्र सामान्य स्थिति में लौट आती हैं। ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम और अल्पकालिक होगा।
दूसरे परिदृश्य में यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो ऊर्जा कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और व्यापारिक लागत में वृद्धि देखने को मिलेगी। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक और व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
आधारभूत अनुमान के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की संभावना धीरे-धीरे मजबूत हो सकती है, जिससे मध्यपूर्व क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद है। साथ ही, वर्ष २०२६ के मध्य से ऊर्जा कीमतों में क्रमिक गिरावट आने की संभावना भी व्यक्त की गई है, जिससे वैश्विक बाजारों को कुछ राहत मिल सकती है।
इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति धीमी रहेगी, लेकिन इसके बाद सुधार की दिशा में बढ़ेगी और २०२७ में पुनः विकास दर में तेजी देखने को मिल सकती है।

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