देवेन्द्र किशोर ढुंगाना
३१ मई २०२६(जेठ १७, २०९३) को प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह ‘बालेन’ द्वारा प्रतिनिधि सभा की बैठक में दिया गया एक वक्तव्य नेपाली राजनीति में व्यापक हलचल का कारण बन गया। विपक्षी सांसद पद्मा अर्याल के लिम्पियाधुरा–लिपुलेक संबंधी प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत ने केवल नेपाल की ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी अनेक स्थानों पर भारत की भूमि पर अतिक्रमण किया है।” इस कथन ने तत्काल संसद के भीतर विरोध और बाहर राष्ट्रवादी बहस को जन्म दिया। इससे उत्पन्न राजनीतिक प्रभाव तथा नेपाल की भावी राष्ट्रीय नीति पर पड़ सकने वाले संभावित असर का विश्लेषण प्रस्तुत है।
१. घटनाक्रम और वक्तव्य का संदर्भ
सांसद पद्मा अर्याल ने भारत–चीन के बीच विकसित किए जा रहे व्यापारिक मार्ग के संबंध में नेपाल सरकार की आधिकारिक धारणा पूछी थी। इसके उत्तर में प्रधानमंत्री ने लिपुलेक और लिम्पियाधुरा विवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि नेपाल सरकार ने कूटनीतिक नोट भेजा था, भारत की ओर से उत्तर प्राप्त हुआ है, तथा दोनों देशों ने इतिहासकारों, सर्वेक्षण विशेषज्ञों और भूगोलविदों की संयुक्त टीम के माध्यम से वार्ता द्वारा समाधान खोजने पर सहमति व्यक्त की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि चूँकि यह समस्या ब्रिटिश भारत के समय से जुड़ी हुई है, इसलिए इस विषय पर ब्रिटेन से भी संवाद किया गया है।
हालाँकि प्रश्नोत्तर के दौरान उन्होंने अचानक यह भी कहा, “प्रधानमंत्री बनने के बाद ही मुझे पता चला कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारत की भूमि पर अतिक्रमण किया है।” यह वक्तव्य संसदीय अभिलेख में दर्ज होते ही विपक्षी दलों ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई।
नेपाली कांग्रेस की मुख्य सचेतक वासना थापा ने कहा कि यह अत्यंत गंभीर और आपत्तिजनक विषय है तथा यदि यह तथ्यहीन है तो इसे संसदीय अभिलेख से हटाया जाना चाहिए। वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद रमेश मल्ल ने प्रश्न उठाया कि क्या कोई राष्ट्राध्यक्ष स्वयं यह स्वीकार करेगा कि उसके देश ने किसी अन्य देश की भूमि पर अतिक्रमण किया है।
२. विवाद का मूल कारण: राष्ट्रवादी भाषा से कूटनीतिक भाषा की ओर संक्रमण
नेपाल में सीमा विवाद लंबे समय से भारत-विरोधी राष्ट्रवाद का प्रमुख आधार रहा है। कालापानी, लिपुलेक और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों को “हमारी भूमि, हमारी पहचान” के रूप में प्रस्तुत करने की राजनीतिक परंपरा जनसमर्थन जुटाने का प्रभावी माध्यम रही है।
बालेन शाह का वक्तव्य इस पारंपरिक राजनीतिक भाषा से भिन्न दिखाई देता है। उन्होंने विवाद को एकतरफा अतिक्रमण के बजाय पारस्परिक सीमा-असंगति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
इसकी दो संभावित व्याख्याएँ की जा सकती हैं।
पहली, राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से यह वक्तव्य कमजोर और प्रमाणहीन माना जा सकता है। संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया कथन भविष्य में भारत द्वारा इस तर्क के समर्थन में उद्धृत किया जा सकता है कि स्वयं नेपाल ने इस स्थिति को स्वीकार किया था। सीमा विशेषज्ञों का भी कहना है कि नेपाल द्वारा भारत की भूमि पर अतिक्रमण किए जाने के सार्वजनिक और प्रमाणित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
दूसरी ओर, कूटनीतिक दृष्टिकोण से इसे एक “Negotiation Opening Position” (वार्ता की प्रारंभिक स्थिति) के रूप में देखा जा सकता है। दशकों से चले आ रहे शून्य-योग राष्ट्रवाद ने वार्ता की संभावनाओं को सीमित किया है। प्रधानमंत्री संभवतः दोनों पक्षों की त्रुटियों को स्वीकार करते हुए संयुक्त अध्ययन, विशेषज्ञ-स्तरीय वार्ता और ब्रिटेन जैसे ऐतिहासिक पक्षकार को शामिल करने की दिशा में मार्ग प्रशस्त करना चाहते हों।
चीन और ब्रिटेन के साथ संवाद का उनका उल्लेख इस विवाद की ऐतिहासिक जड़ों — विशेष रूप से 1816 की सुगौली संधि और ब्रिटिश कालीन मानचित्रों — की ओर संकेत करता है।
३. नेपाली राजनीति में उजागर हुआ दोहरा चरित्र
इस विवाद ने नेपाली वामपंथी राजनीति में लंबे समय से विद्यमान एक विरोधाभास को पुनः उजागर कर दिया है। सार्वजनिक मंचों पर भारत-विरोधी नारों और अतिराष्ट्रवादी भावनाओं का प्रदर्शन किया जाता है, जबकि व्यवहारिक स्तर पर व्यापार, पारवहन और आर्थिक सहयोग के लिए भारत पर निर्भरता बनी रहती है।
बालेन शाह के वक्तव्य ने इसी विरोधाभास को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा किया है।
विपक्षी दलों ने इसे सरकार के विरुद्ध राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया है। किंतु यह भी सत्य है कि पूर्ववर्ती सरकारें भी सीमा विवाद के समाधान हेतु कोई ठोस प्रगति नहीं कर सकी थीं। संसदीय अभिलेख से वक्तव्य हटाने की मांग, सड़क आंदोलनों की चेतावनी तथा “राष्ट्रीय अपमान” जैसे नारों ने समाधान की अपेक्षा राजनीतिक लाभ की प्रवृत्ति को अधिक बल दिया है।
प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तावित “विशेषज्ञ-आधारित तथ्यपरक वार्ता” के मार्ग को छोड़कर सम्पूर्ण बहस का शब्दों और भावनाओं तक सीमित हो जाना नेपाली राजनीति में रणनीतिक सोच की अपेक्षा भावनात्मक प्रतिक्रिया के प्रभुत्व को दर्शाता है।
४. भारत और अंतरराष्ट्रीय आयाम
भारत सरकार इस वक्तव्य पर तत्काल प्रतिक्रिया देने से बच सकती है, क्योंकि प्रधानमंत्री का कथन अप्रत्यक्ष रूप से भारत की उस पुरानी नीति का समर्थन करता प्रतीत होता है जिसके अनुसार सीमा विवाद का समाधान द्विपक्षीय वार्ता से होना चाहिए।
हालाँकि भारतीय मीडिया ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए यह बहस प्रारंभ कर दी है कि नेपाल की पारंपरिक दावेदारी कमजोर पड़ सकती है।
ब्रिटेन को प्रक्रिया में शामिल करने का विचार एक नया कूटनीतिक कदम माना जा सकता है। सीमा विवाद से संबंधित मूल दस्तावेज़, विशेषकर सुगौली संधि और उसके बाद तैयार किए गए ब्रिटिश सर्वेक्षण मानचित्र, इस विवाद की ऐतिहासिक नींव हैं। यदि ब्रिटेन को अभिलेखीय स्रोत अथवा ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध कराने वाले पक्ष के रूप में शामिल किया जा सके, तो नेपाल के दावों को अतिरिक्त ऐतिहासिक आधार मिल सकता है।
हालाँकि भारत इसे विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रयास मानकर इसका विरोध भी कर सकता है।
५. भविष्य की राजनीतिक दिशा और विश्लेषकों की चिंताएँ
राजनीतिक विश्लेषक तीन प्रमुख संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं।
पहली, यदि सरकार यह स्पष्ट नहीं करती कि कथित अतिक्रमण कहाँ और किस सीमा तक हुआ है तथा इसके समर्थन में उपग्रह चित्र, ऐतिहासिक मानचित्र और क्षेत्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करती, तो यह वक्तव्य प्रधानमंत्री की राजनीतिक अपरिपक्वता के उदाहरण के रूप में स्थापित हो सकता है।
दूसरी, यदि विपक्ष राष्ट्रवाद के मुद्दे को संसद और सड़कों दोनों पर आक्रामक रूप से उठाता है, तो सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
तीसरी, यदि भारत सकारात्मक रुख अपनाते हुए संयुक्त तकनीकी समिति के गठन के लिए सहमत होता है, तो बालेन शाह के वक्तव्य को वार्ता प्रक्रिया प्रारंभ कराने वाली पहल के रूप में पुनर्मूल्यांकित किया जा सकता है।
फिलहाल संकेत अधिकतर नकारात्मक दिखाई देते हैं। संसद में चल रही बहस तथ्य, मानचित्र और कानूनी दस्तावेज़ों के बजाय भावनाओं और राजनीतिक निष्ठाओं पर केंद्रित है। “राष्ट्रवाद बनाम व्यवहारिक कूटनीति” का यह द्वंद्व दीर्घकालिक समाधान को और पीछे धकेलता प्रतीत होता है।
अन्त में ,प्रधानमंत्री बालेन शाह की संसदीय अभिव्यक्ति ने नेपाल–भारत सीमा विवाद को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय हित के विरुद्ध गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे दशकों पुराने गतिरोध को तोड़ने के लिए उठाया गया एक साहसिक कूटनीतिक जोखिम समझता है।
वास्तविक प्रश्न शब्दों का नहीं, बल्कि उनके बाद उठाए जाने वाले कदमों का है। यदि नेपाल अपने दावों के ऐतिहासिक, कानूनी और तकनीकी आधारों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर भारत को संयुक्त अध्ययन प्रक्रिया में शामिल करने में सफल होता है, तो यह विवाद सकारात्मक परिणाम की दिशा में बढ़ सकता है।
लेकिन यदि राजनीतिक दल इसे केवल नारेबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखते हैं, तो सीमा विवाद एक बार फिर भावनात्मक राजनीति का बंधक बन जाएगा।
१८१६ की सुगौली संधि से लेकर २०८३ की संसद तक की यात्रा नेपाल को यही शिक्षा देती है कि राष्ट्रवाद भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रमाणों और सुविचारित रणनीति से मजबूत होता है।
बालेन शाह के वक्तव्य ने बहस का द्वार खोल दिया है। अब यह नेपाली राजनीति पर निर्भर करता है कि वह उस द्वार से संवाद, तथ्य और प्रमाण के मार्ग पर आगे बढ़ती है या फिर नारों और भावनात्मक राजनीति की भूलभुलैया में लौट जाती है। यही निर्णय भविष्य में नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति तथा भारत के साथ उसके संबंधों की दिशा निर्धारित करेगा।










