रास्वपा का महाधिवेशन: वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति में नेतृत्व हस्तांतरण और संस्थागत भविष्य की परीक्षा

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भद्रपुर: नेपाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) केवल एक नया राजनीतिक दल भर नहीं है, बल्कि पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति बढ़ते जन-असंतोष की पृष्ठभूमि में उभरी एक वैकल्पिक लोकतांत्रिक शक्ति भी है। यही कारण है कि आगामी जुलाई में आयोजित होने वाला रास्वपा का प्रथम राष्ट्रीय महाधिवेशन पार्टी की एक सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया से कहीं अधिक एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना के रूप में देखा जा रहा है।
यह महाधिवेशन केवल नए नेतृत्व का चयन नहीं करेगा, बल्कि रास्वपा की संस्थागत परिपक्वता, आंतरिक लोकतंत्र, शक्ति-संतुलन तथा भावी राजनीतिक दिशा की भी महत्वपूर्ण परीक्षा होगा। अब तक व्यक्तित्व-केंद्रित छवि के सहारे आगे बढ़ती रही पार्टी एक सुदृढ़ संस्थागत संरचना विकसित कर पाएगी या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर भी इसी महाधिवेशन से प्राप्त होगा।
यद्यपि पार्टी अध्यक्ष के रूप में रवि लामिछाने की निरंतरता लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है, किंतु उपाध्यक्ष, महासचिव तथा सह-महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों को लेकर दिखाई दे रही आकांक्षा और प्रतिस्पर्धा ने रास्वपा के भीतर दूसरी पंक्ति के नेतृत्व निर्माण की बहस को सामने ला दिया है। इन्दिरा राना मगर, प्रतिभा रावल, लीमा अधिकारी, कबिन्द्र बुर्लाकोटी, मनीष झा, विपिन आचार्य, दीपक बोहरा, सोविता गौतम तथा डॉ. अमरेश कुमार सिंह जैसे नेताओं की सक्रियता पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन के पुनर्निर्धारण की ओर संकेत करती है।
विशेष रूप से चुनाव से पूर्व विभिन्न राजनीतिक धाराओं और पृष्ठभूमियों से आए नेताओं का समुचित समन्वय और प्रबंधन वर्तमान नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। विवेकशील–साझा पृष्ठभूमि, स्वतन्त्र राजनीतिक धारा, बालेन्द्र शाह समर्थक समूह तथा एकीकरण प्रक्रिया के माध्यम से शामिल हुए अन्य नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखना रास्वपा की प्रमुख परीक्षाओं में से एक हो सकता है।
इस महाधिवेशन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष समावेशिता और भौगोलिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। वर्तमान में पार्टी की निर्णयकारी संरचनाओं में बागमती प्रदेश के प्रभाव को लेकर आलोचनाएँ हो रही हैं। ऐसे में सातों प्रदेशों के प्रतिनिधित्व के साथ-साथ महिलाओं, दलितों, आदिवासी-जनजातियों, मधेशी समुदाय तथा अन्य वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने का दबाव भी नेतृत्व पर बना हुआ है। यदि नेतृत्व का चयन सर्वसम्मति से होता है, तो भी उसके समावेशी और संतुलित होने की अपेक्षा कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों द्वारा की जा रही है।
रास्वपा स्वयं को पारंपरिक राजनीतिक दलों के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। ऐसे में उसका पहला महाधिवेशन केवल पदाधिकारियों के चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति के अपने दावे को व्यवहार में सिद्ध करने का अवसर भी प्रदान करेगा। यदि सहमति, प्रतिस्पर्धा, समावेशिता और संस्थागत लोकतंत्र के बीच संतुलन स्थापित किया जा सका, तो यह महाधिवेशन नेपाली राजनीति में एक नए शक्ति-केंद्र की परिपक्वता का प्रतीक बन सकता है। अन्यथा, नए राजनीतिक दलों में दिखाई देने वाली व्यक्तित्व-केंद्रित नेतृत्व शैली, गुटीय प्रतिस्पर्धा और संगठनात्मक अस्थिरता जैसी पुरानी समस्याओं से रास्वपा भी मुक्त नहीं है, ऐसा संदेश जनमानस में जा सकता है।
अतः रास्वपा के आगामी महाधिवेशन को केवल एक राजनीतिक दल के आंतरिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि नेपाल में वैकल्पिक राजनीतिक आंदोलन के भविष्य से जुड़े एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

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