वाराणसी गंगा इफ्तार केस: कानूनी पेचीदगियां और ६० दिन बाद जमानत

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वाराणसी: शहर के नमो घाट पर चलती नाव में इफ्तार करने से शुरू हुआ विवाद आखिरकार 14 मुस्लिम युवकों को ६० दिनों तक जेल में रखने और हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद कानूनी उलझनों में तब्दील हो गया है। मार्च २०२६ में रमज़ान के दौरान इन युवकों ने नाव पर इफ्तार किया था और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था। वीडियो में बिरयानी खाने और कथित तौर पर चिकन की हड्डियां नदी में फेंकने का आरोप लगाते हुए भाजपा युवा मोर्चा के स्थानीय अध्यक्ष रजत जायसवाल ने कोतवाली थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी को गिरफ्तार कर लिया था।
​इस मामले में पुलिस ने शुरुआत में धार्मिक भावनाएं आहत करने, सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने और जल प्रदूषण निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था, जिनमें सात साल से कम की सजा का प्रावधान है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार ऐसे मामलों में सीधे गिरफ्तारी के बजाय नोटिस दिया जाना चाहिए, लेकिन पुलिस ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेशी से ठीक पहले मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा ३०८(५) यानी जबरन वसूली की गंभीर और गैर-जमानती धारा जोड़ दी। बाद में सत्र न्यायालय में पुलिस ने खुद स्वीकार किया कि नदी में अपशिष्ट फेंकने का कोई फॉरेंसिक या ठोस सबूत नहीं मिला है, इसलिए जल अधिनियम की धारा हटा ली गई, लेकिन जलाशय दूषित करने की सामान्य धारा को बरकरार रखा गया।
​नगर निगम के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि गंगा में क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं, इसे लेकर कोई विशेष नियम उपलब्ध नहीं है। मजिस्ट्रेट और सेशन कोर्ट से जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद आखिरकार मई २०२६ के मध्य में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन युवकों को राहत दी। हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने पुलिस द्वारा बाद में जोड़ी गई जबरन वसूली की धारा और नाविक के बयानों पर गहरा संदेह व्यक्त किया। अदालत में अभियुक्तों की ओर से एक सप्लीमेंट्री हलफनामा दायर कर मां गंगा और हिंदू समाज से करबद्ध, बिना शर्त माफी मांगी गई और भविष्य में ऐसा न करने का आश्वासन दिया गया, जिसके बाद अदालत ने उनके पछतावे को सच्चा मानते हुए सभी को जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया।

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