नई दिल्ली: सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी योजना ‘विजन २०३०’ इस समय गहरे वित्तीय दबाव और क्षेत्रीय तनाव के घेरे में है। देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करने और उसे आधुनिक तकनीक का वैश्विक केंद्र बनाने के सपने के साथ शुरू की गई अरबों डॉलर की ‘मेगा परियोजनाओं’ के बजट में भारी कटौती की जा रही है, जबकि कई बड़े प्रोजेक्ट्स को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और इसके कारण तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट ने सऊदी अरब के राजस्व को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे इन बेहद खर्चीली परियोजनाओं पर ब्रेक लगाना पड़ा है।
महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में कटौती और स्थगन
सऊदी अरब ने अपने करीब एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के सॉवरेन वेल्थ फंड (पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड) के दम पर दुनिया को हैरान करने वाली इमारतें और शहर बनाने का दावा किया था। लेकिन अब जमीनी हकीकत को देखते हुए इन योजनाओं का दायरा छोटा किया जा रहा है:
’द लाइन’: उत्तर-पश्चिम सऊदी अरब के रेगिस्तान में १६१ किलोमीटर की लंबाई में फैला एक अनोखा और सीधा शहर बनने वाला था, लेकिन अब इस प्रोजेक्ट को काफी सीमित और साधारण रूप दिया जा रहा है।
ट्रोजेना विंटर रिसॉर्ट: मरुस्थलीय देश के पहाड़ों में कृत्रिम बर्फ बनाकर स्की ढलानें और लग्जरी होटल तैयार करने का यह प्रोजेक्ट अब व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है। साल २०२९ के ‘एशियाई शीतकालीन खेलों’ की मेजबानी सऊदी अरब से छिन चुकी है और अब ये खेल कजाकिस्तान में आयोजित किए जाएंगे।
’द क्यूब’: ५० बिलियन डॉलर की अनुमानित लागत से बनने वाले इस आवासीय और वाणिज्यिक (दफ्तर) प्रोजेक्ट को भी फिलहाल रोक दिया गया है।
स्पोर्ट्स में निवेश: देश की छवि बदलने के लिए सऊदी अरब ने ‘लिव गोल्फ टुर’ जैसे खेलों पर लगभग ५ बिलियन डॉलर खर्च किए, लेकिन इससे अब तक कोई वित्तीय लाभ नहीं मिल पाया है।
विदेशी निवेशकों की बेरुखी की मुख्य वजह
सऊदी अरब को उम्मीद थी कि इन परियोजनाओं के लिए दुनिया भर से भारी निवेश आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। साल २०१७ में क्राउन प्रिंस द्वारा रियाद के ‘रिट्ज-कार्लटन होटल’ में देश के बड़े कारोबारियों और अधिकारियों को हिरासत में लेने (जिसे सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई बताया था) और २०१८ में पत्रकार जमाल खाशोज्जी की बेरहमी से हुई हत्या ने सऊदी अरब की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि दमन के इस माहौल ने निवेशकों को डरा दिया। निवेशक स्थिरता और भरोसे का माहौल चाहते हैं, जो सऊदी के इस कड़े प्रशासनिक रवैये में दिखाई नहीं दिया।
सलाहकारों की ‘हां में हां’ मिलाने वाली संस्कृति
’सऊदी इंक’ पुस्तक के लेखक एलेन आर. वाल्ड के मुताबिक, सऊदी अरब के अधिकारियों और सलाहकारों ने बाजार की वास्तविक स्थिति को समझे बिना सिर्फ शासक को खुश करने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कीं। राजा या क्राउन प्रिंस जो सुनना चाहते हैं, बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए सलाहकार और विदेशी कंपनियां वही बताती रहीं। इस ‘जी-हजूर’ संस्कृति के कारण ही ये योजनाएं उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
इससे पहले २००० के दशक में पूर्व सम्राट किंग अब्दुल्ला द्वारा लाया गया १०० बिलियन डॉलर का ‘इकोनॉमिक सिटीज’ कार्यक्रम भी इसी तरह विफल रहा था।
सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक दमन
’विजन २०३०’ के तहत सऊदी अरब के सामाजिक परिदृश्य में निश्चित रूप से बड़े और वास्तविक बदलाव आए हैं। महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार मिलना, सिनेमा, कन्सर्ट और मनोरंजन के साधनों का खुलना वहां की युवा आबादी के बीच बेहद लोकप्रिय है।
हालांकि, राजनीतिक स्तर पर असहमति और आलोचना को आज भी बर्दाश्त नहीं किया जाता और विरोध करने वालों को कड़ी सजा दी जाती है। ‘स्पोर्ट्सवॉशिंग’ और ‘आर्टवॉशिंग’ के जरिए मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को छिपाने के सऊदी के प्रयासों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
नई रणनीति: ‘छोटा मगर व्यावहारिक’
बड़ी परियोजनाओं के लड़खड़ाने के बाद सऊदी अधिकारी अब अपनी गलतियों को आंशिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं और रणनीति में बदलाव ला रहे हैं। अब ध्यान ‘नियोम’ जैसे विशाल और असंभव दिखने वाले प्रोजेक्ट्स के बजाय छोटी और सफल होने योग्य योजनाओं पर केंद्रित किया जा रहा है:
लाल सागर में स्थित ‘सिंदालाह द्वीप रिसॉर्ट’ (एक पारंपरिक शैली का रिज़ॉर्ट), पुरानी राजधानी ‘दिरियाह’ का पुनर्विकास, और प्राचीन सांस्कृतिक स्थल ‘अल-उला’ के सफल विकास को अब विजन २०३० की बुनियादी सफलता के रूप में पेश किया जा रहा है।
इसके अलावा, सऊदी अरब साल २०३४ के फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी हासिल कर चुका है, इसलिए अब सारा ध्यान नियंत्रित बजट में व्यावहारिक बुनियादी ढांचे को तैयार करने पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब का यह नया और व्यावहारिक रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत का तरीका बदल सकता है और इससे निवेशकों का भरोसा कुछ हद तक वापस लौट सकता है।










