नई दिल्ली: भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ रविवार को आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश का रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता देता है, ठीक उसी तरह भारत भी अपने राष्ट्रीय हितों को ही सर्वोपरि रखता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो इस समय भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं। भारत पहुंचने से पहले उन्होंने बयान दिया था कि भारत जितना चाहे अमेरिका से तेल खरीद सकता है। अमेरिका के इस रुख पर भारत के विपक्षी दलों और रणनीतिक विशेषज्ञों ने चिंता जताई थी। उनका मानना था कि ऊर्जा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर होना एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो सकती है। इसी पृष्ठभूमि में जवाब देते हुए जयशंकर ने साफ तौर पर कहा कि अमेरिका की तरह ही हम भी ‘इंडिया फ़र्स्ट’ की नीति पर चलते हैं। रविवार को दिल्ली में आया विदेश मंत्री का यह बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है और इसे अमेरिका को भारत का स्पष्ट जवाब माना जा रहा है।
रणनीतिक साझेदारी और राष्ट्रीय हितों पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने एक सवाल के जवाब में कहा कि ट्रंप प्रशासन अपनी विदेश नीति में बहुत स्पष्ट शब्दों में ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ की बात करता है, जबकि भारत की तरफ से ‘इंडिया फ़र्स्ट’ की बात की जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों ही देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को सामने रखकर बातचीत करते हैं। ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां दोनों देशों के राष्ट्रीय हित एक साथ मेल खाते हैं और इसी वजह से दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी बनी हुई है, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे भी हो सकते हैं जहां दोनों के विचार अलग हों और वैसी स्थितियों को आपसी समझ से संभालना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर बात करते हुए भारतीय विदेश मंत्री ने देश की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उनके अनुसार, भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि देश के पास विश्वसनीय, बड़े, विविध और सस्ते स्रोत उपलब्ध हों। उन्होंने कहा कि अमेरिका इनमें से कई पैमानों पर खरा उतरता है, लेकिन दुनिया में कई अन्य देश भी मौजूद हैं। इसलिए भारत अलग-अलग स्रोतों से सबसे किफायती दरों पर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करना जारी रखेगा, क्योंकि अपने नागरिकों को सस्ती दरों पर ऊर्जा उपलब्ध कराना सरकार की मुख्य जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऊर्जा को बाजार के नियमों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए ताकि वैश्विक बाजार में किसी तरह की रुकावट न आए।
हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक टैरिफ को लेकर भी तनाव देखा गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही कड़ा रुख अपनाते हुए भारत समेत कई देशों पर टैरिफ लगाए हैं, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर २५ फीसदी अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया गया था। इस व्यापारिक असंतुलन पर सफाई देते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि भारत-अमेरिका संबंधों ने अपनी कोई लय नहीं खोई है। उन्होंने ट्रंप के रुख पर स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति भारत के साथ तनाव नहीं बढ़ाना चाहते, बल्कि वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बने बड़े व्यापारिक असंतुलन को ठीक करना चाहते हैं। रूबियो ने उम्मीद जताई कि दोनों देशों के व्यापारिक प्रतिनिधि जल्द ही एक ऐसा व्यापार समझौता तैयार कर लेंगे जो दीर्घकालिक, टिकाऊ और दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होगा।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री से एच-१बी, एफ-१ और जे-१ वीज़ा नियमों में बदलाव को लेकर भी सवाल किया गया। इस पर रूबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी माइग्रेशन सिस्टम का आधुनिकीकरण किसी देश विशेष को देखकर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर किया जा रहा है। उन्होंने अमेरिका के आंतरिक संकट को स्वीकार करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दो करोड़ से अधिक लोग अवैध रूप से अमेरिका में प्रवेश कर चुके हैं, और इस प्रवासन संकट का समाधान ढूंढना अमेरिका की प्राथमिकता है, हालांकि इसका भारत से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसके अलावा, अमेरिका में भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ हो रही नस्लीय टिप्पणियों पर दुख जताते हुए रूबियो ने कहा कि वे इसे बेहद गंभीरता से लेते हैं और दुनिया के हर देश में ऐसे मूर्ख लोग होते हैं जो ऐसी बेवकूफ़ी भरी टिप्पणियां करते हैं। उन्होंने अमेरिका को एक बेहद स्वागत करने वाला देश बताया जिसे दुनिया भर से आए प्रवासियों ने समृद्ध बनाया है।
दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के उस बयान पर भारत में सियासत गरमा गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से ५०० अरब डॉलर का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सरकार से कई गंभीर सवाल पूछे हैं। उन्होंने पूछा कि यदि प्रधानमंत्री विदेशी मुद्रा बचाने और ऊर्जा खपत कम करने की बात करते हैं, तो अमेरिका से रिकॉर्ड आयात करने पर सहमति क्यों दी गई और क्या इससे भारतीय रुपये की कीमत में और गिरावट नहीं आएगी। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि भारतीय विदेश नीति से जुड़ी इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण जानकारी नई दिल्ली के बजाय सबसे पहले वॉशिंगटन डीसी से क्यों सामने आ रही है।









