न्यायपालिका में सुशासन को लेकर नया राजनीतिक टकराव

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भद्रपुर( देवेंद्र किशोर): नेपाल के राजनीतिक और न्यायिक क्षेत्र में हाल के दिनों में प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति प्रकरण ने व्यापक बहस को जन्म दिया है। संवैधानिक परिषद द्वारा चौथी वरीयता के न्यायाधीश डॉ. मनोज कुमार शर्मा को प्रधान न्यायाधीश के लिए सिफारिश किए जाने के बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की द्वारा व्यक्त तीखी असहमति ने न केवल न्यायपालिका के भीतर के विवाद को उजागर किया है, बल्कि इसने राज्य संचालन की शैली, सुशासन की अवधारणा और नई राजनीतिक शक्तियों की कार्यदिशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्की की अभिव्यक्ति भावनात्मक, आक्रामक और प्रतिरोधात्मक शैली में सामने आई। उन्होंने “खसी का ह्याकुलो चुनने जैसा” उपमा देते हुए संवैधानिक परिषद के निर्णय को परंपरा, वरिष्ठता और न्यायिक स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप के रूप में चित्रित किया। उनकी असहमति मुख्यतः न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा पर केंद्रित दिखाई देती है, हालांकि राजनीतिक हलकों में इसे केवल नीतिगत मतभेद नहीं बल्कि बदलते शक्ति संतुलन के प्रति असहजता के रूप में भी देखा गया है।
विशेष रूप से वर्तमान सत्ता संरचना पारंपरिक दलों की निरंतरता नहीं, बल्कि हाल के “जेन जी आंदोलन” की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि से उभरी राजनीतिक धारा से जुड़ी मानी जा रही है। इस आंदोलन ने राज्य के पुराने शक्ति केंद्रों, सुस्ती, भ्रष्टाचार और पहुँचवाद के अंत की मांग करते हुए कार्यसम्पादनमुखी शासन की आवश्यकता पर बल दिया था। इसी जनमत के आधार पर स्थापित सरकार और नए राजनीतिक नेतृत्व ने “परिणाममुखी प्रशासन” को प्राथमिकता दी हुई प्रतीत होती है।
इस संदर्भ में वरिष्ठता के बजाय कार्यक्षमता और निर्णय क्षमता के आधार पर नियुक्ति को आवश्यक सुधार का संकेत मानने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। नेपाल की प्रशासनिक और न्यायिक संरचना में लंबे समय से केवल वरिष्ठता के आधार पर जिम्मेदारियाँ बाँटे जाने से कार्यसम्पादन कमजोर होने की आलोचना होती रही है। इसलिए सरकार द्वारा “फास्ट ट्रैक” शैली में संस्थागत सुधार की कोशिश को परिवर्तनकारी राजनीतिक सोच की अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
हालाँकि सुधार के नाम पर संस्थागत संतुलन बिगड़ने का खतरा भी उतना ही संवेदनशील विषय है। न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम संरक्षक संस्था मानी जाती है, इसलिए उसमें राजनीतिक प्रभाव का आभास भी गंभीर माना जाता है। कार्की द्वारा उठाई गई यही चिंता पूरी तरह अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती। विशेष रूप से कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल को पीछे छोड़कर चौथी वरीयता के न्यायाधीश को आगे लाने के विषय ने महिला नेतृत्व, न्यायिक परंपरा और संवैधानिक अभ्यास पर बहस को और गहरा बना दिया है।
फिर भी कार्की की हालिया टिप्पणियों में केवल न्यायिक चिंता ही नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के प्रति व्यक्तिगत असंतोष भी झलकता है। सरकार को “आत्माशून्य” और “जेब से चलने वाली” शैली का आरोप लगाना, सुकुम्बासी बस्तियों को हटाने के अभियान को “ज्यादती” कहना तथा राजनीतिक प्रतिशोध की भाषा का प्रयोग करना उनकी टिप्पणी को पूर्णतः निष्पक्ष संस्थागत आलोचना से अधिक राजनीतिक प्रतिक्रिया के करीब ले जाता है।
वर्तमान सरकार के सामने चुनौतियाँ दो स्तरों पर हैं। पहली, जनता द्वारा अपेक्षित सुशासन, भ्रष्टाचार नियंत्रण और तेज सेवा प्रवाह को व्यवहार में साबित करना। दूसरी, सुधार के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर न होने देना। यह सत्य है कि जनमत परिवर्तन चाहता है, लेकिन परिवर्तन की प्रक्रिया को विधि, संविधान और संस्थागत विश्वास को साथ लेकर चलना होगा।
नेपाल इस समय पुरानी राजनीतिक संस्कृति और नई पीढ़ी की कार्यसम्पादनमुखी चेतना के बीच संक्रमणकाल से गुजर रहा है। यही संक्रमण कभी न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव पैदा करता है, तो कभी पुराने शक्ति केंद्रों और नए नेतृत्व के बीच वैचारिक टकराव को जन्म देता है। इसलिए आज की आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नीति, प्रशासनिक सुधार और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने वाली परिपक्व राजनीतिक संस्कृति के निर्माण की है।
यदि सरकार अपने निर्णय को पारदर्शी, संवैधानिक और परिणाममुखी ढंग से सही साबित कर पाती है, तो आलोचनाएँ स्वतः कमजोर पड़ जाएँगी। लेकिन यदि सुधार के नाम पर शक्ति केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी, तो वह लोकतंत्र की मूल नींव पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकती है। यही कारण है कि वर्तमान बहस केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का विवाद नहीं, बल्कि नेपाल की भावी शासन प्रणाली कैसी होगी, इसका संकेत भी है।

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