अब नई पीढ़ी के कंधों पर लोकतंत्र के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी

IMG-20260511-WA0059

भद्रपुर(देवेन्द्र किशोर): मार्च ५के प्रतिनिधि सभा चुनाव ने नेपाली राजनीति में एक निर्णायक मोड़ ला दिया है। लंबे समय से सत्ता, संरचना और संसाधनों पर पकड़ बनाए हुए पारंपरिक राजनीतिक दल जनमत से कमजोर पड़ने लगे हैं, जिससे देश की राजनीतिक दिशा बदलने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। विशेष रूप से नेकपा एमाले, नेपाली कांग्रेस तथा मधेशी जनता के नाम पर क्षेत्रीय और जातीय राजनीति करने वाले दल अब जनविश्वास खोते हुए रक्षात्मक स्थिति में पहुँच गए हैं।
२७५ सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में एमाले का केवल २५ सीटों तक सीमित होना सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि पुरानी राजनीतिक शैली के प्रति जनता की असंतुष्टि की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। चुनाव के बाद पार्टी के भीतर पैदा हुई अनिश्चितता, अध्यक्ष केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी, नेतृत्व हस्तांतरण पर बहस और बैठकों का अनिश्चित होना यह दर्शाता है कि एमाले का संकट केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि वैचारिक स्तर तक पहुँच चुका है।
एमाले के भीतर इस समय दो धाराएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। एक धारा पुरानी शक्ति संरचना को बचाए रखना चाहती है, जबकि दूसरी धारा पीढ़ीगत परिवर्तन और रूपांतरण के पक्ष में खड़ी है। रामबहादुर थापा ‘बादल’ को संसदीय दल का नेता बनाने के निर्णय ने इस विवाद को और तेज कर दिया। युवा नेताओं द्वारा नए नेतृत्व की मांग उठाए जाने के बावजूद फिर पुराने चेहरों को आगे लाने से कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष बढ़ा है।
विशेष रूप से सुहाङ नेम्वाङ जैसे युवाओं को अवसर न दिया जाना केवल किसी व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर पुरानी मानसिकता की निरंतरता है। युवाओं द्वारा पार्टी कार्यालय में प्रदर्शन किया जाना इस बात का संकेत है कि कार्यकर्ता अब अंधभक्ति की राजनीति से बाहर निकल रहे हैं।
यही स्थिति नेपाली कांग्रेस में भी दिखाई देती है। दशकों तक लोकतंत्र, संविधान और परिवर्तन के नाम पर सत्ता चलाने वाली कांग्रेस अब अपने ही राजनीतिक विरासत के बोझ तले दबती जा रही है। नेतृत्व की पुनरावृत्ति, गुटबंदी, अवसरवाद और नीतिगत अस्पष्टता ने कांग्रेस का सामाजिक आधार कमजोर कर दिया है। नई पीढ़ी कांग्रेस को परिवर्तन की शक्ति नहीं बल्कि सत्ता बचाने वाली संरचना के रूप में देखने लगी है।
मधेशी जनता के अधिकार, पहचान और समावेशिता के नाम पर राजनीति करने वाले दलों की स्थिति भी अलग नहीं है। मधेश के नाम पर राजनीति करने वाले कई नेताओं ने जनता के वास्तविक मुद्दों से अधिक सत्ता साझेदारी और व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप मधेश के आम नागरिक आज भी बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य संकट से मुक्त नहीं हो सके हैं। जातीय और क्षेत्रीय भावनाओं को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने वाली राजनीति धीरे-धीरे असफल होती जा रही है।
इन सभी दलों पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि उन्होंने राज्य व्यवस्था को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया। सत्ता में पहुँचने के बाद अपने रिश्तेदारों, समर्थकों और आर्थिक हित समूहों को लाभ पहुँचाने की प्रवृत्ति ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को गंभीर रूप से कमजोर किया। भूमाफियाओं को संरक्षण, सुकुम्बासी समस्या का राजनीतिक इस्तेमाल, ठेकेदारी आधारित अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने जनता के भीतर गहरी निराशा पैदा की है।
विशेष रूप से “सुकुम्बासी व्यवस्थापन” के नाम पर वास्तविक भूमिहीनों के बजाय पार्टी समर्थकों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति ने सामाजिक न्याय की अवधारणा को ही विकृत कर दिया। राजनीतिक दलों ने भूमाफियाओं से गठजोड़ कर सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा करवाया और उसे चुनावी साधन के रूप में इस्तेमाल किया। इससे राज्य के प्रति नागरिकों का विश्वास कमजोर हुआ है।
नेपाल का वर्तमान राजनीतिक संकट केवल व्यक्तियों की विफलता नहीं बल्कि पुरानी राजनीतिक संस्कृति का संकट है। आंदोलन, क्रांति और परिवर्तन के नारों से स्थापित नेता सत्ता में पहुँचने के बाद जनता की बजाय संरचना और शक्ति की रक्षा में केंद्रित हो गए। लोकतंत्र को जनभागीदारी का माध्यम बनाने के बजाय उसे सीमित समूहों के शक्ति-संतुलन में बदल दिया गया।
इसी बीच नई पीढ़ी में बढ़ती असंतोष की भावना और वैकल्पिक राजनीतिक चेतना आशा की किरण बनकर उभरी है। आज का युवा केवल भाषण नहीं बल्कि परिणाम चाहता है। वह पारदर्शिता, जवाबदेही, सुशासन, तकनीक-मैत्री प्रशासन और अवसरों तक समान पहुँच की मांग कर रहा है। यही कारण है कि पारंपरिक दल कमजोर होते जा रहे हैं और स्वतंत्र तथा वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा है।
लेकिन केवल पुराने नेताओं की आलोचना करने से समाधान संभव नहीं है। नई पीढ़ी को खुद को केवल “विरोध की शक्ति” तक सीमित रखने के बजाय स्पष्ट वैचारिक आधार, दीर्घकालीन आर्थिक दृष्टिकोण और संस्थागत राजनीतिक संस्कृति का निर्माण करने की चुनौती स्वीकार करनी होगी।
आज नेपाल के सामने तीन प्रमुख राजनीतिक कार्यभार दिखाई देते हैं। पहला, दलों के भीतर लोकतांत्रिक पुनर्संरचना आवश्यक है। राजनीति किसी एक व्यक्ति या समूह के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं रहनी चाहिए। दूसरा, राज्य व्यवस्था को दलगत नियंत्रण से मुक्त कर संस्थागत सुशासन स्थापित करना होगा। तीसरा, नई पीढ़ी को नेतृत्व हस्तांतरित कर नीति-निर्माण में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
देश इस समय गंभीर आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट से गुजर रहा है। लाखों युवा विदेश पलायन कर रहे हैं। कृषि, उद्योग और उत्पादन क्षेत्र कमजोर हो चुके हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में असमानता बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में राजनीतिक नेतृत्व का अभी भी सत्ता समीकरण, भागबंदी और आंतरिक संघर्षों में उलझे रहना दुर्भाग्यपूर्ण है।
मार्च ५के चुनाव ने एक संदेश स्पष्ट कर दिया है—जनता अब केवल नारों पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। वह परिणाम चाहती है, जवाबदेही चाहती है और नई राजनीतिक संस्कृति चाहती है। यदि पारंपरिक दल इस संदेश को नहीं समझेंगे तो उनका राजनीतिक पतन और तेज हो जाएगा।
अब आवश्यकता पुरानी असफल राजनीतिक चक्र को दोहराने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जनता के जीवन से जोड़ने वाली नई राजनीतिक परियोजना निर्माण की है। नई पीढ़ी का नेतृत्व यदि साहस, वैचारिक स्पष्टता और नैतिक प्रतिबद्धता के साथ आगे आ सके, तभी नेपाल की राजनीति फिर से जनमुखी बन सकती है। अन्यथा सत्ता बदलने पर भी जनता की नियति नहीं बदलेगी।

About Author

Advertisement