देवेन्द्र किशोर
नेपाल की समकालीन राजनीति एक बार फिर संवैधानिक प्रक्रिया, शक्ति संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों की बहस के केंद्र में आ गई है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के महासचिव शंकर पोखरेल द्वारा हाल ही में व्यक्त की गई धारणा केवल विपक्षी टिप्पणी भर नहीं है, बल्कि यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि नेपाल की राजनीतिक संरचना किस दिशा में आगे बढ़ रही है। संसद सत्र स्थगित कर अध्यादेश के माध्यम से संवैधानिक परिषद की बैठक बुलाना, उसके बाद न्यायपालिका के नेतृत्व चयन की प्रक्रिया में वरिष्ठता की परंपरा तोड़े जाने के आरोप लगना, और न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने की आशंका व्यक्त होना—इन सभी घटनाओं ने लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।
नेपाल के संविधान ने शक्ति पृथक्करण और संतुलन को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल आधार माना है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—तीनों को अपनी-अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों के भीतर स्वतंत्र रूप से संचालित होना चाहिए, यही संवैधानिक मान्यता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने की शिकायत लगातार उठती रही है। विशेष रूप से संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश और उसके उपयोग को लेकर यह आरोप मजबूत हुआ है कि संविधान की “आत्मा” की बजाय केवल “प्रक्रिया” को प्राथमिकता दी जा रही है।
शंकर पोखरेल द्वारा उठाया गया एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा है। न्यायालय किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की अंतिम आशा माना जाता है। जब न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक निकटता, शक्ति संतुलन या स्वार्थ समूहों का प्रभाव दिखाई देने लगे, तो इससे केवल न्यायपालिका की विश्वसनीयता ही कमजोर नहीं होती, बल्कि पूरे राज्य तंत्र पर नागरिकों का भरोसा भी कम होने लगता है। वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश किए जाने को लेकर उठे विवाद ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है।
नेपाल के राजनीतिक इतिहास को देखें तो न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। अतीत में संसद विघटन, सरकार गठन, दल विभाजन और संवैधानिक व्याख्या जैसे मुद्दों पर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। कुछ मामलों में अदालत की सक्रियता को लोकतंत्र की रक्षा के रूप में देखा गया, जबकि कुछ लोगों ने इसे “न्यायिक अतिक्रमण” कहा। लेकिन वर्तमान बहस का स्वरूप अलग है। अब सवाल यह नहीं है कि न्यायपालिका सरकार को चुनौती देती है या नहीं, बल्कि यह है कि कहीं सरकार स्वयं न्यायपालिका को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने की कोशिश तो नहीं कर रही।
यदि राज्य के संवैधानिक अंग धीरे-धीरे राजनीतिक नियंत्रण में जाने लगें, तो लोकतंत्र का स्वरूप केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होने का खतरा पैदा हो जाता है। चुनाव होते रहने के बावजूद यदि संस्थागत स्वतंत्रता कमजोर हो जाए, तो शासन व्यवस्था धीरे-धीरे अधिनायकवादी प्रवृत्ति की ओर बढ़ सकती है। विश्व राजनीति में भी ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जहाँ निर्वाचित सरकारों ने संवैधानिक संस्थाओं को नियंत्रित कर लोकतांत्रिक आवरण के भीतर ही अधिनायकवाद का अभ्यास किया है। नेपाल में भी हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे ही जोखिमों की ओर संकेत करते दिखाई दे रहे हैं।
शंकर पोखरेल द्वारा उल्लेखित “भाद्र 23 और 24” का संदर्भ तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम की ओर इशारा करता है, जहाँ संवैधानिक प्रक्रियाओं से अधिक सत्ता समीकरण को प्राथमिकता दिए जाने के आरोप लगे थे। उस समय राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और बौद्धिक वर्ग पर यह आलोचना हुई थी कि वे संस्थागत विचलन के विरुद्ध समय रहते साझा आवाज नहीं उठा सके। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वही कमजोरी दोहराए जाने का खतरा दिखाई दे रहा है।
समस्या केवल एक नियुक्ति, एक अध्यादेश या एक सरकार के व्यवहार तक सीमित नहीं है। मूल समस्या राजनीतिक संस्कृति में निहित है। सत्ता में आने के बाद संवैधानिक संस्थाओं को अपने अनुकूल बनाने की प्रवृत्ति नेपाल के लगभग सभी राजनीतिक दलों में दिखाई देती रही है। अंतर केवल शैली और अवसर का है। यही कारण है कि नेपाल का लोकतंत्र संस्थागत होने के बजाय अधिक व्यक्तिकेंद्रित और सत्ता-केंद्रित बनता गया है।
आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप से अधिक लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करने की है। संवैधानिक परिषद जैसे निकायों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सहमतिमूलक बनाना अत्यंत आवश्यक है। यदि न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव को कम नहीं किया गया, तो भविष्य में न्यायालय के प्रति जनता का विश्वास गंभीर रूप से कमजोर हो सकता है।
नेपाल ने लंबे संघर्ष के बाद संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की है। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनाव कराने से नहीं होती; बल्कि स्वतंत्र न्यायपालिका, जिम्मेदार कार्यपालिका और प्रभावी संसद के बीच संतुलन बनाए रखने से ही संभव होती है। यदि राज्य के संवैधानिक निकाय धीरे-धीरे राजनीतिक स्वार्थों के साधन बनते गए, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा भले बना रहे, लेकिन उसकी आत्मा लगातार कमजोर होती जाएगी। वर्तमान राजनीतिक बहस इसी गंभीर चेतावनी की ओर संकेत कर रही है।











