एमाले में ‘ओली युग’ का अंत या कायाकल्प? हस्ताक्षर अभियान के बाद सत्ता परिवर्तन का नया खेल

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काठमांडू: संसदीय चुनाव में मिली करारी हार ने नेकपा एमाले के भीतर के आंतरिक राजनीतिक संतुलन को बुरी तरह हिलाकर रख दिया है। नेतृत्व परिवर्तन की पुरजोर मांग के साथ शुरू हुआ हस्ताक्षर अभियान फिलहाल थमा हुआ नजर आ रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे किसी बड़े तूफान से पहले की शांति माना जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी और अब उनके गिरते स्वास्थ्य के बीच नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट ने पार्टी के भीतर ‘शीतयुद्ध’ की स्थिति पैदा कर दी है, जहां हर कोई अगले केंद्रीय समिति की बैठक का इंतजार कर रहा है।
​इस बार नेतृत्व परिवर्तन की यह बहस इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कल तक ओली के साथ साये की तरह रहने वाले महासचिव शंकर पोखरेल और उपाध्यक्ष विष्णु पौडेल जैसे दिग्गज नेता भी अब बदलाव के पक्ष में बंद कमरों में चर्चा कर रहे हैं। विशेष रूप से उपाध्यक्ष पृथ्वीसुब्बा गुरुङ का यह बयान कि ‘अब अध्यक्ष को ढोना नामुमकिन है’, पार्टी के भीतर शक्ति के केंद्र बदलने का साफ संकेत दे रहा है। गुरुङ के अनुसार अब केवल चेहरा बदलने से काम नहीं चलेगा बल्कि संगठन की कार्यशैली और नीति में भी व्यापक बदलाव की जरूरत है, जिसे वे पार्टी का समग्र रूपांतरण बता रहे हैं।
​पार्टी के विधान में विशेष महाधिवेशन का प्रावधान है, जिसके तहत यदि दो तिहाई जिला समितियां मांग करें तो नेतृत्व को पद छोड़ना पड़ सकता है या नया चुनाव कराना होगा। हालांकि नेपाल बौद्धिक परिषद के अध्यक्ष गजेंद्र थपलिया जैसे नेताओं को उम्मीद है कि ओली स्वयं ही किसी उत्तराधिकारी का नाम आगे कर पार्टी की एकता के लिए रास्ता साफ कर देंगे। यदि ओली ने स्वेच्छा से पद नहीं छोड़ा तो पार्टी के भीतर का यह असंतोष किसी भी वक्त विशेष महाधिवेशन के रूप में फूट सकता है, जो नेतृत्व के लिए सम्मानजनक नहीं होगा।
​वर्तमान में एमाले के भीतर की यह हलचल केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं है, बल्कि सालों से जमी हुई सत्ता के प्रति असंतोष का विस्फोट है। कार्यवाहक अध्यक्ष रामबहादुर थापा ‘बादल’ ने हालांकि असंतुष्ट गुटों को मनाने की कोशिश की है, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी और सुरेंद्र पांडे जैसे नेताओं के कड़े रुख ने ओली को बैकफुट पर ला दिया है। अब सबकी निगाहें आने वाली बैठक पर टिकी हैं, जो न केवल चुनाव की समीक्षा करेगी बल्कि यह भी तय करेगी कि एमाले में ओली युग का अंत कैसे होगा और पार्टी का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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