कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद अब राज्य का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि नया मुख्यमंत्री कौन होगा? 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस के शासन को उखाड़ फेंकने के बाद भाजपा के लिए नेतृत्व का चयन न केवल सत्ता के संचालन बल्कि राज्य में अपनी जड़ों को स्थायी बनाने के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भाजपा की परंपरा रही है कि वह अधिकांश राज्यों में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं करती है और इस चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा रहे। उन्होंने राज्य में २० से अधिक रैलियां कीं और बंगाल की संस्कृति व अस्मिता से जुड़कर मतदाताओं का दिल जीतने की कोशिश की। अब जबकि जीत मिल चुकी है, पार्टी के भीतर मंथन का दौर शुरू हो गया है। चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट संकेत दिया था कि बंगाल का मुख्यमंत्री कोई ‘भूमिपुत्र’ यानी बंगाली ही होगा। इसके अलावा, राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भाजपा ने जो कड़ा रुख अपनाया था, उसे देखते हुए राजनीतिक गलियारों में अटकलें हैं कि पार्टी किसी महिला को नेतृत्व सौंपकर एक बड़ा संदेश दे सकती है।
इस दौड़ में कई प्रमुख नाम चर्चा में बने हुए हैं। भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराने के बाद सुवेंदु अधिकारी सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं क्योंकि उनके पास जबरदस्त सांगठनिक क्षमता और जमीनी पकड़ है। वहीं दिलीप घोष को पार्टी को एक शक्तिशाली विपक्ष के रूप में खड़ा करने और संगठन को आक्रामक बनाने का श्रेय दिया जाता है। महिला नेतृत्व की बात करें तो अग्निमित्रा पॉल की बेबाक छवि और रूपा गांगुली की लोकप्रियता उन्हें रेस में बनाए रखती है। साथ ही निशिथ प्रमाणिक जैसे युवा चेहरे और शमिक भट्टाचार्य जैसे संतुलित नेताओं के नामों पर भी विचार किया जा रहा है।
अंतिम निर्णय भाजपा के शीर्ष नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को लेना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ऐसे चेहरे को प्राथमिकता देगी जो न केवल कुशल प्रशासक हो, बल्कि बंगाल के सामाजिक ताने-बाने को समझते हुए लंबे समय तक पार्टी के जनाधार को बनाए रख सके। फिलहाल, पूरे देश की नजरें कोलकाता और दिल्ली के बीच जारी इस हलचल पर टिकी हैं कि आखिर बंगाल की कमान किसे सौंपी जाएगी।









