नई दिल्ली: ऐसे समय में जब दुनिया के कई हिस्से युद्ध और तनाव से जूझ रहे हैं, भारत को वैश्विक शांति स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाने की जरूरत बताई जा रही है। लेख में कहा गया है कि भारत की परंपरा हमेशा से शांति, सह-अस्तित्व और सद्भाव की रही है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकप्रिय रहे गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि महात्मा गांधी ने इसमें ‘विजयी’ की जगह ‘प्रेमिक’ शब्द का सुझाव दिया था। यह भारत की उस सोच को दर्शाता है जिसमें विस्तारवाद या दूसरों पर प्रभुत्व की भावना नहीं, बल्कि प्रेम और शांति को प्राथमिकता दी जाती है।
लेख में कहा गया है कि दुनिया में अधिकांश युद्ध विस्तार की इच्छा और प्रभुत्व की मानसिकता के कारण होते रहे हैं। वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के एक प्रसिद्ध कथन का हवाला देते हुए बताया गया है कि तीसरे विश्व युद्ध के बाद मानवता को फिर से पत्थरों के युग में लौटना पड़ सकता है।
दोनों विश्व युद्धों की भीषणता का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि लाखों-करोड़ों लोगों की जान गई और वैश्विक स्तर पर भारी तबाही हुई। इसके बावजूद शांति बनाए रखने के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सके। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना भी इसी उद्देश्य से हुई थी, लेकिन वह भी कई बड़े संघर्षों को रोकने में असफल रहा।
लेख में १९९४ के रवांडा नरसंहार और १९९५ के बोस्निया संकट जैसे उदाहरण देकर बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं समय रहते हस्तक्षेप नहीं कर पाईं। साथ ही यह भी कहा गया है कि आज दुनिया में मौजूद परमाणु हथियार मानवता के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं।
शांति के पक्षधर नेताओं जैसे बर्ट्रेंड रसेल और मार्टिन लूथर किंग जूनियर का उल्लेख करते हुए लेख में कहा गया है कि युद्ध केवल विनाश लाता है, जबकि उसी संसाधन से विकास और कल्याण के कार्य किए जा सकते हैं।
खेलों में भी बढ़ते तनाव का जिक्र करते हुए कहा गया है कि प्रतिस्पर्धा को युद्ध का रूप नहीं देना चाहिए। अंत में निष्कर्ष दिया गया है कि भारत को ‘विश्व गुरु’ के रूप में आगे बढ़कर शांति स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि यही वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।









