कार्तिकेय वाजपेयी की पुस्तक ‘द अनबीकमिंग’ का विमोचन
पुस्तक की भूमिका परम पावन दलाई लामा और स्वामी सर्वप्रियानंद द्वारा लिखी गई है
कोलकाता: शहर के साहित्यिक परिदृश्य में एक उल्लेखनीय क्षण तब दर्ज हुआ जब नवोदित लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने कोलकाता में अपनी पुस्तक द अनबीकमिंग का विमोचन किया। जिस शहर में साहित्य और आध्यात्मिकता लंबे समय से एक पवित्र संवाद में जुड़ी रही हैं, वहीं इस पुस्तक का लोकार्पण विशेष महत्व रखता है। ‘सिटी ऑफ जॉय’ में आयोजित यह कार्यक्रम जो अपनी बौद्धिक चेतना, चिंतन परंपराओं और लिखित शब्द के प्रति सम्मान के लिए जाना जाता है लेखकों, विद्वानों और उत्साही पाठकों को उपन्यास के दार्शनिक विषयों पर गहन संवाद के लिए एकत्र लेकर आया।
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का विमोचन प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर में हुआ। यह आयोजन एक आत्मीय और मननशील संवाद के रूप में सामने आया, जिसमें ९१.९ फ्रेंड्स एफएम के प्रमुख जिमी टैंग्री ने कार्तिकेय वाजपेयी से बातचीत की। इस सत्र की शोभा वरिष्ठ अभिनेता एवं लेखक श्री बरुण चंदा की उपस्थिति से और बढ़ गई, जिसने शाम को अतिरिक्त गरिमा और साहित्यिक गहराई प्रदान की। इस चर्चा ने शांति और आत्मचिंतन का वातावरण रचा जो कोलकाता की उस कालातीत विरासत को प्रतिध्वनित करता है, जहाँ विचार, आस्था और साहित्यिक अभिव्यक्ति का संगम होता रहा है और साथ ही उपन्यास की दार्शनिक गहराई को भी प्रतिबिंबित करता है।
इस पुस्तक की भूमिका परम पावन दलाई लामा और स्वामी सर्वप्रियानंद द्वारा लिखी गई है। कार्यक्रम के दौरान इन भूमिकाओं का उल्लेख किया गया, जिन्हें पुस्तक की आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रामाणिकता के रूप में देखा गया, और जो इसे करुणा तथा आत्म-अन्वेषण की जीवंत परंपरा से जोड़ती हैं।
पुस्तक विमोचन के अवसर पर लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा, “द अनबीकमिंग इस समझ पर आधारित है कि हमारा अधिकांश दुःख उन पहचानों से चिपके रहने से उत्पन्न होता है, जो भय और अपेक्षाओं से गढ़ी जाती हैं। यही मूल रूप से हमें एक व्यक्ति के रूप में सीमित करती हैं। इसलिए निराकार बनें, विचारों से मुक्त हों और अपनी स्वयं-निर्मित छवि तथा दूसरों द्वारा थोपी गई धारणाओं से स्वयं को मुक्त करें। ‘अनबीकमिंग’ एक शांत वापसी है एक ऐसा आमंत्रण, जिसमें जीवन पर कोई उद्देश्य थोपने के बजाय उसे स्वयं अपना अर्थ प्रकट करने दिया जाता है। आधुनिक जीवन में आत्म-अन्वेषण अत्यंत आवश्यक है; यह हमें स्पष्टता के साथ कार्य करने और उपस्थिति व जागरूकता में स्थिर रहने में मदद करता है।”
अनासक्ति पर बोलते हुए उन्होंने आगे कहा, “माया दो शक्तियों के माध्यम से काम करती है भय और लोभ। दोनों ही हमारा ध्यान भटका देती हैं। अनासक्ति का अर्थ पीछे हटना नहीं है, बल्कि वास्तविकता की ओर ध्यान की पुनःवापसी है।”
यह संवाद, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, पुस्तक में खोजे गए केंद्रीय विषयों जैसे पहचान, आंतरिक स्पष्टता, उद्देश्य और ‘अनबीकमिंग’ की प्रक्रिया पर केंद्रित रहा। चर्चा में समकालीन महत्वाकांक्षा, दृढ़ता और अर्थ की आधुनिक खोज को भी परखा गया, तथा लगातार अशांत होती दुनिया में आत्मचिंतन के महत्व पर बल दिया गया। श्रोताओं की गहन सहभागिता ने इन विषयों की प्रासंगिकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
द अनबीकमिंग एक मननशील उपन्यास है, जो सिद्धार्थ- एक प्रसिद्ध क्रिकेटर और अजय, उसके अनुभवी कोच के विकसित होते संबंध पर केंद्रित है। जब उनका दीर्घकालिक गुरु-शिष्य संबंध परीक्षा से गुजरता है, तब दोनों को पहचान के भ्रम, अज्ञात के भय और अपेक्षाओं के बोझ का सामना करना पड़ता है। भावनात्मक सत्य और दार्शनिक अन्वेषण के साथ कथा-वाचन को पिरोते हुए यह उपन्यास विरासत में मिली पहचानों को त्यागने और अपनी मौलिक सत्ता की ओर लौटने की कला पर विचार करता है।











