“शेरशाह सूरी को ‘सूरी’ क्यों कहा जाता है, उपनाम में छिपा है कैसा इतिहास?”

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शेरशाह सूरी का नाम भारतीय इतिहास में एक महान शासक के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने केवल पांच साल (१५४०-१५४५) के शासनकाल में वह कार्य किए जिनकी याद आज भी बरकरार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शेरशाह सूरी को ‘सूरी’ क्यों कहा जाता है? क्या यह कोई उपाधि थी, या फिर किसी वंश का नाम? आइए, जानते हैं इस नाम के पीछे की असली कहानी।
फरीद खान से शेरशाह सूरी तक:
शेरशाह सूरी का असली नाम फरीद खान था। उनका जन्म १४८६ के आसपास बिहार के सासाराम में हुआ था। उनके पिता हसन खान सूरी बिहार के एक छोटे जागीरदार थे। फरीद का घर का माहौल उनके अनुकूल नहीं था और उन्हें अपनी सौतेली मां से भी अच्छा व्यवहार नहीं मिलता था। इसके कारण फरीद घर छोड़कर जौनपुर गए, जहां उन्होंने शिक्षा ली और अरबी तथा फारसी की पढ़ाई की। यही शिक्षा उनके प्रशासनिक कौशल की नींव बनी।
कैसे मिला शेर खान का नाम?
इसी दौरान फरीद खान को अफगान शासक बहार खान लोहानी की सेवा में जगह मिली। एक दिन शिकार के दौरान एक विशाल बाघ ने फरीद पर हमला किया। फरीद ने बाघ को अपनी तलवार से एक झटके में मार डाला। बहार खान ने उसकी बहादुरी देख उसे ‘शेर खान’ की उपाधि दी। यह नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
सूरी नाम का रहस्य:
शेर खान अफगानिस्तान के सूर कबीले से थे, और जब उन्होंने सत्ता प्राप्त की तो अपने कबीले के नाम पर ‘सूरी’ वंश की स्थापना की। उनका यह नाम उनकी नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास को दर्शाता था। शेर खान ने १५३९ में हुमायूं को बिहार के चौसा युद्ध में हराया और १५४० में कन्नौज की लड़ाई में भी विजय प्राप्त की। इसके बाद वह दिल्ली के शासक बने और ‘शेरशाह सूरी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
प्रशासनिक सुधार:
शेरशाह सूरी केवल एक महान योद्धा नहीं थे, बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे। उनके शासनकाल में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए:
रुपया का अविष्कार: उन्होंने चांदी के सिक्के को रुपया नाम दिया, जो आज के भारतीय मुद्रा का मूल है।
ग्रैंड ट्रंक रोड:
उन्होंने बंगाल से लेकर काबुल तक एक प्रमुख सड़क का निर्माण करवाया।
डाक व्यवस्था:
घुड़सवार डाक प्रणाली की शुरुआत की।
भूमि सुधार: उन्होंने किसानों से सीधे कर लेना शुरू किया और राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया।
असमय मृत्यु और विरासत:
१५४५ में कालिंजर किले पर हमले के दौरान शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई। हालांकि उनका शासनकाल सिर्फ पांच साल तक रहा, लेकिन उनके द्वारा किए गए सुधारों का प्रभाव आज भी देखा जाता है। बिहार के सासाराम में स्थित उनका मकबरा उनकी महानता की याद दिलाता है।
इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण हैं शेरशाह सूरी?
शेरशाह सूरी का महत्व सिर्फ उनके युद्ध कौशल में नहीं था, बल्कि उनके प्रशासनिक सुधारों ने भारत की शासन प्रणाली को एक नई दिशा दी। उनका जीवन संघर्ष और दूरदर्शिता का प्रतीक बना हुआ है।

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