देवेंद्र किशोर ढुंगाना
भद्रपुर: नेपाल के संविधान ने राज्य को स्पष्ट रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया है—जहाँ राज्य किसी एक धर्म के पक्ष में नहीं खड़ा होता, बल्कि सभी के प्रति समान दूरी और सम्मान बनाए रखता है। ऐसे संवैधानिक मूल्यों की सबसे स्पष्ट और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति शपथ ग्रहण जैसे औपचारिक क्षणों में दिखाई देती है। इसलिए, प्रधानमंत्री के रूप में बालेन्द्र शाह का आसन्न शपथ ग्रहण केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं है; यह भावी शासन की दृष्टि, प्राथमिकताओं और मूल्यों का भी संकेत है।
लेकिन इसी संदर्भ में शपथ ग्रहण समारोह में धार्मिक पूजा-पाठ और अनुष्ठान शामिल होने की चर्चा सार्वजनिक बहस का विषय बन गई है। यदि राज्य के आधिकारिक मंच पर किसी एक धर्म से जुड़ा अनुष्ठान किया जाता है, तो वह केवल व्यक्तिगत आस्था का प्रदर्शन नहीं रह जाता; वह राज्य के चरित्र पर प्रश्न खड़ा करने वाला संकेत बन जाता है। धर्म मानने या न मानने की स्वतंत्रता हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन यदि राज्य स्वयं किसी आस्था का प्रतिनिधित्व करने लगे, तो इससे समावेशिता और समानता की नींव कमजोर पड़ सकती है।
इतिहास ने दिखाया है कि जैसे-जैसे राजनीति और धर्म के बीच की दूरी कम होती है, शक्ति संतुलन डगमगाने लगता है। जब शासन धार्मिक वैधता खोजने लगता है, तो आलोचना कमजोर पड़ जाती है और संस्थागत जवाबदेही ओझल होने लगती है। नेपाल ने राजतंत्र से गणतंत्र तक की अपनी यात्रा भी ऐसे ही अनुभवों से सीखते हुए तय की है। इसलिए आज के लोकतांत्रिक नेतृत्व से अपेक्षा की जाती है कि वे उन ऐतिहासिक कमजोरियों को दोहराने के बजाय संस्थागत परिपक्वता का परिचय देंगे।
बालेन्द्र शाह एक नई पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं- परिवर्तन, पारदर्शिता और वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति के प्रतीक के रूप में उभरे हैं। इसी कारण जन-अपेक्षाएँ भी असाधारण हैं। ऐसे में शपथ ग्रहण को धार्मिक रंग देना भले ही एक ‘औपचारिकता’ जैसा लगे, लेकिन इसका संदेश गहरा होता है। यह संकेत देता है कि भावी सरकार की प्राथमिकता- संविधान है या परंपरा, किस दिशा में झुकी हुई है।
निजी जीवन में कोई भी नेता मंदिर, मठ या मस्जिद जा सकता है; यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षणों में उन्हें अपनी निजी आस्था को संस्थागत आचरण से अलग रखने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि राज्य किसी एक व्यक्ति का नहीं होता, यह विविध आस्थाओं, भाषाओं और संस्कृतियों वाले नागरिकों की साझा संरचना है।
यदि शपथ ग्रहण जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में धार्मिक अनुष्ठान मिलाए जाते हैं, तो इससे समाज के अन्य समूहों में अलगाव की भावना पैदा हो सकती है। यह संदेश जा सकता है कि राज्य सबका नहीं, बल्कि कुछ का है। ऐसी धारणा लोकतंत्र के लिए घातक होती है, क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद ही समानता और समावेशिता पर टिकी होती है।
इसलिए, बालेन्द्र शाह के लिए यह क्षण केवल पदभार ग्रहण का नहीं, बल्कि सिद्धांत की परीक्षा का भी है। उन्हें यह दिखाना होगा कि नई पीढ़ी की राजनीति केवल चेहरे में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी अलग है। धर्म के प्रति सम्मान रखते हुए भी राज्य को तटस्थ बनाए रखने का संतुलन स्थापित करना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
अंततः, शपथ कोई धार्मिक संस्कार नहीं है; यह संविधान और जनता के प्रति सार्वजनिक प्रतिबद्धता है। इसे शुद्ध, स्पष्ट और निष्पक्ष बनाए रखना ही लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान है। यदि नेतृत्व स्वयं इस सीमा को धुंधला करता है, तो उसका प्रभाव केवल एक दिन के समारोह तक सीमित नहीं रहेगा, यह पूरे शासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।









