लिपुलेख फिर चर्चा में: इतिहास, कूटनीति और राजनीतिक समय-सापेक्षता का प्रश्न

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देवेंद्र किशोर ढुंगाना

नेपाल की उत्तरी सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रा केवल एक भौगोलिक बिंदु नहीं है; यह दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में संवेदनशीलता, असंतुलन और कूटनीतिक जटिलताओं का प्रतीक है। हाल के समय में भारत द्वारा लिपुलेख के माध्यम से चीन के साथ सीमा व्यापार विस्तार की तैयारी के संकेत मिलने के बाद यह मुद्दा पुनः नेपाली राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। लेकिन प्रश्न उठता है—यह मुद्दा अभी इतनी तीव्रता से क्यों उठाया गया है? क्या यह केवल राष्ट्रीय सरोकारों का पुनर्स्मरण है, या नए राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की एक रणनीतिक चाल?
लिपुलेख विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो इसकी जड़ें १८१६ की सुगौली संधि तक जाती हैं। इस संधि ने नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा निर्धारण करते हुए काली नदी को पश्चिमी सीमा माना था। लेकिन काली नदी का वास्तविक स्रोत कहाँ है, यह प्रश्न आज तक स्पष्ट रूप से सुलझ नहीं पाया है। नेपाल लिम्पियाधुरा क्षेत्र को काली नदी का उद्गम मानते हुए कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना भूभाग बताता रहा है। वहीं भारत कालापानी क्षेत्र पर प्रशासनिक नियंत्रण बनाए हुए है और लिपुलेख को अपने रणनीतिक तथा व्यापारिक मार्ग के रूप में उपयोग करता रहा है।
२०१५ में भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार करने का समझौता होने पर नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था। उस समय भी नेपाल की औपचारिक भागीदारी के बिना हुए इस समझौते को उसकी संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न के रूप में देखा गया था। इसके बाद २०२० में भारत द्वारा नए मानचित्र में कालापानी क्षेत्र को शामिल किए जाने पर नेपाल में व्यापक राजनीतिक और जनस्तरीय प्रतिक्रिया देखने को मिली। नेपाल सरकार ने भी नया मानचित्र जारी कर अपने दावे को औपचारिक रूप से स्थापित करने का प्रयास किया।
इस प्रकार लिपुलेख विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है; यह समय-समय पर राजनीतिक, कूटनीतिक और भावनात्मक तरंगों के साथ सतह पर आने वाला पुराना प्रश्न है। लेकिन वर्तमान संदर्भ में इसके पुनरुत्थान को केवल ऐतिहासिक निरंतरता के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। इसमें वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, शक्ति-संतुलन और मीडिया एजेंडा का भी गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
नेपाल में हाल ही में हुए चुनावों के बाद नई सरकार गठन की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे संक्रमणकालीन समय में राष्ट्रीयता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों का उठना असामान्य नहीं है। इतिहास बताता है कि नेपाल में राष्ट्रीयता और सीमा से जुड़े मुद्दे अक्सर राजनीतिक दबाव बनाने के प्रभावी माध्यम के रूप में उपयोग किए जाते रहे हैं। नई सरकार के गठन के दौरान लिपुलेख जैसे मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाना कहीं सरकार पर प्रारंभिक दबाव बनाने का प्रयास तो नहीं—यह प्रश्न स्वाभाविक है।
इसका एक कूटनीतिक आयाम भी है। नेपाल, भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय संबंध हमेशा एक संवेदनशील संतुलन पर आधारित रहे हैं। लिपुलेख दर्रा भौगोलिक रूप से इन तीनों देशों के संगम क्षेत्र के निकट होने के कारण इसका रणनीतिक महत्व और बढ़ जाता है। भारत के लिए यह चीन के साथ व्यापारिक और सामरिक पहुँच का मार्ग है, जबकि चीन के लिए यह दक्षिण की ओर व्यापार विस्तार का संभावित द्वार है। नेपाल के लिए यह उसकी संप्रभुता और भू-अधिकार से सीधे जुड़ा प्रश्न है।
इसी संदर्भ में कुछ कूटनीतिक विश्लेषक लिपुलेख मुद्दे के पुनरुत्थान को भारत के साथ वार्ता में ‘लेवरेज’ बनाने की कोशिश के रूप में भी देखते हैं। जब औपचारिक वार्ताएँ ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुँचतीं, तब सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक दबाव को वार्ता के पूरक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाना असामान्य नहीं है। लेकिन ऐसी रणनीति में दीर्घकालीन समाधान की जगह तात्कालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने का जोखिम भी निहित रहता है।
मीडिया की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रतिस्पर्धात्मक मीडिया के दौर में राष्ट्रीयता, सीमा और कूटनीति जैसे मुद्दे हमेशा उच्च प्रभाव वाले विषय बन जाते हैं। लिपुलेख जैसे संवेदनशील विषय को प्रमुखता देने से जनचर्चा बढ़ती है, बहस तेज होती है और मीडिया की पहुँच विस्तृत होती है। लेकिन सवाल यह भी है—क्या ऐसी प्रस्तुति तथ्यों से अधिक भावनाओं को उकसाने का काम तो नहीं कर रही? यदि मीडिया संतुलित, प्रमाण-आधारित और संदर्भयुक्त विश्लेषण प्रस्तुत नहीं कर पाता, तो इससे समाधान की बजाय भ्रम और तनाव बढ़ सकते हैं।
लिपुलेख विवाद का मूल प्रश्न स्पष्ट और साझा रूप से स्वीकार्य ऐतिहासिक तथा भौगोलिक आधार के अभाव से जुड़ा है। जब तक नेपाल और भारत के बीच काली नदी के वास्तविक स्रोत पर सहमति नहीं बनती, तब तक इस विवाद का समाधान कठिन ही रहेगा। इसके लिए भावनात्मक नारों की बजाय तकनीकी अध्ययन, ऐतिहासिक दस्तावेजों की पुनर्समीक्षा और उच्चस्तरीय कूटनीतिक संवाद आवश्यक हैं।
नई सरकार के लिए यह एक जटिल परीक्षा है। एक ओर राष्ट्रीय भावना को संबोधित करने का दबाव है, तो दूसरी ओर पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की आवश्यकता। अत्यधिक आक्रामकता कूटनीतिक संबंधों को बिगाड़ सकती है, जबकि अत्यधिक चुप्पी राष्ट्रीय हितों के प्रति उदासीनता का संकेत दे सकती है। इसलिए एक संतुलित, स्पष्ट और दीर्घकालीन रणनीति की आवश्यकता है।

अंततः लिपुलेख के इस पुनरुत्थान को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह नेपाल के लिए अपनी भू-राजनीतिक स्थिति, कूटनीतिक क्षमता और आंतरिक राजनीतिक परिपक्वता की परीक्षा का अवसर भी है। यदि इसे केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया, तो यह समस्या और जटिल हो सकती है। लेकिन यदि इसे गंभीर, तथ्य-आधारित और दीर्घकालीन दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी बन सकता है।
इसलिए आज की सबसे बड़ी चुनौती ‘मुद्दे को उठाना’ नहीं, बल्कि ‘मुद्दे का समाधान करना’ है। लिपुलेख केवल एक सीमा विवाद नहीं, बल्कि नेपाल की कूटनीतिक परिपक्वता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण की कसौटी भी है।

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