रूस ने २५ साल बाद सोना बेचना शुरू किया, युद्ध खर्च बना कारण

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नई दिल्ली: रूस ने लगभग २५ वर्षों में पहली बार अपने केंद्रीय बैंक के भंडार से सोना बेचना शुरू किया है। रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी और फरवरी २०२६ के दौरान रूस ने कुल करीब १४ टन सोना बेचा, जो २००२ के बाद किसी भी दो महीनों में की गई सबसे बड़ी बिक्री मानी जा रही है।
बताया जा रहा है कि पहले रूस में वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बैंक के बीच सोने का लेनदेन मुख्यतः कागजी रूप में होता था, लेकिन अब केंद्रीय बैंक सीधे बाजार में भौतिक सोना बेच रहा है। इसे रूस की वित्तीय रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते बढ़ते सैन्य खर्च और सरकारी बजट पर बढ़ते दबाव से जुड़ा हो सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, रूस का बजटीय घाटा अनुमान से अधिक बढ़ गया है और इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार विभिन्न विकल्प तलाश रही है।
रूस के सोने के भंडार में इस बिक्री के बाद कमी आई है और यह चार वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, देश के पास अब भी २००० टन से अधिक सोना मौजूद है, जिससे वह दुनिया के बड़े सोना धारकों में बना हुआ है।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सोने की कीमतों में हाल के समय में आई तेजी, जो लगभग ५००० डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई है- भी इस फैसले का एक कारण हो सकती है। इससे रूस को ऊंची कीमत पर अपने भंडार का कुछ हिस्सा बेचकर नकदी जुटाने का अवसर मिला है।
इसके अलावा, तेल और गैस से होने वाली आय में गिरावट तथा पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने भी रूस की वित्तीय स्थिति को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों में सोना बेचना सरकार के लिए अल्पकालिक वित्तीय राहत का एक साधन माना जा रहा है।
हालांकि, १४ टन सोना रूस के कुल भंडार की तुलना में बहुत बड़ी मात्रा नहीं है, लेकिन इसे इस बात के संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि देश पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और आने वाले समय में वह और कदम उठा सकता है।

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