दिल्ली: आज संसद में रिपीलिंग एंड अमेंडिंग बिल, २०२५ के समर्थन में बोलते हुए दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र के सांसद राजू बिष्ट ने कहा कि यह विधेयक भारत की कानूनी व्यवस्था को स्वच्छ, सुसंगत, समसामयिक और नागरिक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विधेयक कोई नया कानून नहीं बनाता, बल्कि समय के साथ अप्रासंगिक, अनावश्यक और अप्रचलित हो चुके कानूनों को निरस्त या संशोधित करता है।
इस अवसर पर सांसद बिष्ट ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लागू आमेलित क्षेत्र (विधि) अधिनियम, १९५४
(Absorbed Areas (Law) Act, 1954) का विषय भी संसद के संज्ञान में लाया। यह उल्लेखनीय है कि इस कानून के माध्यम से दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल राज्य के कानून लागू किए गए थे। इससे पहले हमारा क्षेत्र नॉन-रेगुलेटेड एरिया, शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स तथा पार्शियली एक्सक्लूडेड एरिया जैसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत शासित था। यद्यपि इस अधिनियम ने औपचारिक रूप से हमारे क्षेत्र को पश्चिम बंगाल की कानूनी संरचना में शामिल किया, फिर भी इन क्षेत्रों के लोग आज तक न्याय और समानता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सांसद बिष्ट ने संसद को अवगत कराया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, गरिमा और न्याय की गारंटी देता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में “न्याय” की यह संवैधानिक प्रतिबद्धता देश के सबसे उपेक्षित क्षेत्रों तक भी पहुँची है, जो “सबका साथ, सबका विकास” की भावना को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने यह भी कहा कि दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स के लोग आज भी अपनी पहचान, आकांक्षाओं और संवैधानिक अधिकारों के सम्मानजनक व न्यायोचित समाधान की आशा में प्रतीक्षारत हैं।
इसी क्रम में सांसद बिष्ट ने कहा कि केंद्र सरकार हमारे क्षेत्र के लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान के प्रति गंभीर और ईमानदार है, और वार्ता के लिए इंटरलोक्यूटर की नियुक्ति सरकार की संवाद एवं शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
उन्होंने दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स क्षेत्र की बहुआयामी चुनौतियों को भी उजागर किया—सीमापार घुसपैठ के कारण तेज़ी से हो रहा जनसांख्यिक परिवर्तन, जिसके चलते आदिवासी और मूल निवासी अपने ही भू-भाग में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं; प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन; विकास की गंभीर कमी; कमजोर संपर्क संरचना; आर्थिक प्रगति का अभाव; तथा युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की कमी। उन्होंने संसद को बताया कि डीजीएचसी (DGHC) या जीटीए (GTA) जैसी व्यवस्थाएँ इन समस्याओं का समाधान करने में विफल रही हैं। अब हमारे क्षेत्र के लिए संविधान के अंतर्गत एक स्थायी समाधान ही एकमात्र मार्ग है, और उसका समय पर पूरा होना अत्यंत आवश्यक है।










