बेबी चक्रवर्ती
कोलकाता: १९०२ की एक शुक्रवार भोर में विवेकानंद नींद से उठकर पंचांग की ओर देखे। आज वही दिन है, अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस, और शायद मेरे प्रस्थान का दिन। उन्हें अपनी माता भुवनेश्वरी देवी की बात याद आ गई। उस करुणामयी, प्रसन्न मुख का ध्यान करते ही उनके हृदय में उठ रही पीड़ा की सारी छाया मानो दूर हो गई।
विवेकानंद उस दिन असाधारण रूप से प्रसन्न थे। मन में नई प्रसन्नता, शरीर में नई शक्ति का अनुभव हो रहा था। उन्हें लगा मानो उनकी सारी अस्वस्थता दूर हो गई हो। शरीर हल्का और सुंदर लग रहा था, कहीं कोई पीड़ा नहीं थी। स्वामीजी मंदिर गए और लंबे समय तक ध्यान व उपासना में लीन रहे। उस सुबह उनके मन में संगीत की ध्वनि गूंज रही थी। बीमारी का कोई लक्षण नहीं था, इसलिए आनंद और संगीत लौट आए थे। पूजा के बाद उन्होंने अपने गुरुभाइयों के साथ हंसते हुए फल और गरम दूध ग्रहण किया।

सुबह साढ़े आठ बजे उन्होंने प्रेमानंद को बुलाकर कहा, ठाकुर के पूजा स्थान पर मेरे ध्यान का आसन तैयार कर दो। साढ़े नौ बजे स्वामी प्रेमानंद भी वहां पूजा के लिए आए, पर विवेकानंद उस समय एकांत चाहते थे। उन्होंने प्रेमानंद से कहा, मुझे ठाकुर के शयन कक्ष में ध्यान करने दो और सभी दरवाजे-खिड़कियां बंद कर दो।
उस दिन वे लगभग ग्यारह बजे तक गहन ध्यान में लीन रहे। ध्यान समाप्त होने पर वे बाहर आए और गुनगुनाने लगेफ “क्या मेरी माँ श्यामा काली है?
काली, रजत, सुनहरी,
हृदय में हल्का स्पंदन हो रहा है।”
गुरुभाइयों ने उस दिन उनके तेजस्वी और प्रसन्न रूप को देखकर आश्चर्य से उनकी ओर देखा। लगभग साढ़े ग्यारह बजे उन्होंने सबको साथ बैठकर भोजन करने के लिए कहा। उस दिन वे अकेले नहीं खाए, बल्कि सबके साथ भोजन किया।
सुबह गंगा तट पर मछुआरों की नावें इकट्ठी होती थीं। गंगा की हिलसा मछलियां नावों में भरी रहती थीं। यह समाचार सुनते ही स्वामीजी ने बड़े उत्साह से हिलसा मछली मंगवाई। उनके आदेश पर विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार किए गए। उन्हें मानो आभास था कि उनके पास अब केवल कुछ घंटे ही शेष हैं। इसलिए उन्होंने उस दिन जीवन का आनंद लेने का निश्चय किया।
एकादशी के कारण भूख अधिक लगी थी। स्वामीजी हंसते हुए बोले, आज तो खूब खाओ, हिलसा का रस भी लो और तली हुई हिलसा भी। भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम किया और फिर प्रेमानंद से बोले, संन्यासी का दिन में सोना उचित नहीं, चलो थोड़ा अध्ययन करें।
उन्होंने शुद्धानंद से कहा, पुस्तकालय से शुक्ल यजुर्वेद ले आओ। ग्रंथ देखते हुए उन्होंने कहा, इस वेद पर महिधर की टीका मुझे संतोष नहीं देती। तंत्रशास्त्र में वर्णित सुषुम्ना नाड़ी और उसके रहस्य का बीज वैदिक मंत्रों में ही छिपा है, पर महिधर उसे समझ नहीं पाए। इतना कहकर वे शांत हो गए।
दोपहर एक से चार बजे तक उन्होंने ब्रह्मचारियों को व्याकरण पढ़ाया। पाणिनि के सूत्रों को वे रोचक कथाओं के साथ समझाते रहे, जिससे कक्षा हंसी-मजाक से भर गई। बाद में एक कप गरम दूध पीकर वे प्रेमानंद के साथ लगभग दो मील पैदल चलते हुए बेलूड़ बाजार तक गए। उस समय उनका स्वास्थ्य इतना चलने की अनुमति नहीं देता था, फिर भी उस दिन उन्हें कोई पीड़ा नहीं हुई।
सांझ लगभग पांच बजे वे मठ लौट आए। आम के वृक्ष के नीचे गंगा किनारे बैठकर उन्होंने साथियों के साथ बातचीत की और तंबाकू भी पिया। लगभग डेढ़ घंटे बाद संध्या होने लगी। कुछ संन्यासी चाय पी रहे थे, स्वामीजी ने भी एक कप चाय ली।
सात बजे संध्या आरंभ हुई। स्वामीजी को मानो आभास था कि अब समय अधिक नहीं है। उन्होंने अपने शिष्य ब्रजेंद्र को साथ लेकर अपने कक्ष में जाकर कहा, मुझे दो जपमालाएं दो और बाहर बैठकर जप करो। जब तक मैं न बुलाऊं, भीतर मत आना।
लगभग सात बजकर पैंतालीस मिनट पर उन्होंने ब्रजेंद्र को पुकारा और कहा, खिड़की खोल दो, गर्मी लग रही है। वे फर्श पर बिछे बिस्तर पर लेट गए। उनके हाथ में जपमाला थी। ब्रजेंद्र उन्हें पंखा कर रहा था। कुछ देर बाद उन्होंने कहा, अब हवा बंद कर दो और मेरे पैरों को थोड़ा दबा दो।
रात लगभग नौ बजे अचानक उनका शरीर थोड़ा हिला। दाहिना हाथ कांप उठा, माथे पर पसीने की बूंदें दिखाई दीं। वे मानो एक बच्चे की तरह रो पड़े। फिर एक गहरी लंबी सांस ली। उनका सिर धीरे-धीरे हिलते हुए तकिए से नीचे गिर गया। नाक और होंठों के पास रक्त की हल्की बूंदें दिखाई दीं, पर उनके मुख पर अद्भुत दिव्य आभा थी।
४ जुलाई १९०२ की उस रात नौ बजे के कुछ बाद स्वामी विवेकानंद ने अंतिम श्वास ली। दिन भर वे सामान्य दिनों की तरह ही कार्य करते रहे थे, इसलिए किसी को भी उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई आशंका नहीं थी।
कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद अक्सर कहते थे कि वे चालीस वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेंगे। वास्तव में उन्होंने मात्र उन्तालीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया।
मृत्यु से दो दिन पहले उन्होंने सिस्टर निवेदिता को अपने सामने बैठाकर भोजन कराया और फिर उनके चरण धोए। यह देखकर निवेदिता चकित रह गईं और कारण पूछा। तब विवेकानंद ने मुस्कराते हुए कहा, क्या तुम्हें स्मरण नहीं कि यीशु ने भी अपने शिष्यों के साथ ऐसा ही किया था?
निवेदिता ने आश्चर्य से कहा, वह तो अंतिम भोज के समय हुआ था। इस पर स्वामीजी हल्के से मुस्कराकर बोले, “कल लड़की।”
दो दिन बाद निवेदिता समझ सकीं कि स्वामीजी के शब्दों में छिपा संकेत क्या था। इस प्रकार सबको अप्रस्तुत छोड़कर बंगाल के महानतम मनीषियों में से एक स्वामी विवेकानंद ने संसार को विदा कहा।









