नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने भाई-भतीजावाद और खुदगर्जी को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिशाप करार देते हुए हरियाणा सरकार की एक आवासीय समिति द्वारा शासी निकाय के सदस्य और उनके अधीनस्थ को किए गए दो फ्लैटों का आवंटन रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें आवंटन प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इनकार किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि शासी निकाय के सदस्य और उसके अधीनस्थ को किया गया आवंटन मनमाना, पक्षपातपूर्ण तथा समिति के पात्रता मानदंडों के विपरीत था।
पीठ ने टिप्पणी की, “भाई-भतीजावाद और स्वार्थपरता लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिकूल हैं, विशेषकर तब जब यह ऐसे संगठन में हो, जिसमें सरकारी सेवा के सदस्य शामिल हों और जो पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा करता हो।”
न्यायालय ‘हुडा, शहरी संपदा और नगर एवं ग्रामीण योजना कर्मचारी कल्याण संगठन’ (एचईडब्ल्यूओ) के सदस्य दिनेश कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में उच्च श्रेणी के दो सुपर डीलक्स फ्लैटों के आवंटन को चुनौती दी गई थी। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता विज्ञापन के तहत सभी पात्रता शर्तें पूरी करता था, जबकि संबंधित शासी निकाय का सदस्य छह माह की प्रतिनियुक्ति अवधि भी पूरी नहीं कर पाया था।
अदालत ने कहा, “हमें तीसरे प्रतिवादी को किए गए आवंटन को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं दिखता। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात और स्वार्थ का प्रदर्शन है।”
शक्तियों के दुरुपयोग को गंभीर मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय का निर्णय रद्द कर दिया। साथ ही हुडा पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। तीसरे प्रतिवादी बी.बी. गुप्ता पर ५० हजार रुपये तथा चौथे प्रतिवादी पूरन चंद पर 25 हजार रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया।










