नई दिल्लीः टेस्ट क्रिकेट का भविष्य बदलने का दावा करने वाली इंग्लैंड की ‘बेज़बॉल’ रणनीति आज खुद गहरे संकट में फँसी हुई है। ऑस्ट्रेलिया ने महज एक महीने के भीतर एशेज पर कब्ज़ा जमाकर इंग्लैंड की सोच और रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टेस्ट क्रिकेट को बचाने का दावा अब खोखले नारे जैसा प्रतीत होने लगा है और बेन स्टोक्स की कप्तानी वाली इंग्लैंड टीम एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
इंग्लैंड अपनी आक्रामक रणनीति पर अडिग रहा, लेकिन निर्णायक क्षणों में टीम पूरी तरह बिखरी हुई नजर आई। पिछले १८ महीनों के प्रदर्शन को देखें तो यह नतीजा चौंकाने वाला नहीं था। बातें बड़ी-बड़ी की गईं, लेकिन मैदान पर परिणाम निराशाजनक रहे। नतीजतन, आज इंग्लैंड क्रिकेट दुनिया भर में आलोचना और उपहास का विषय बन चुका है।
मैकुलम को हटाने की मांग और यथार्थ:
पूर्व इंग्लिश क्रिकेटरों और विश्लेषकों का गुस्सा स्वाभाविक है। इसी कारण ब्रेंडन मैकुलम को कोच पद से हटाने की मांग तेज़ होती जा रही है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इससे वास्तव में स्थिति सुधरेगी? सर ज्योफ्री बॉयकॉट ने पूर्व दिग्गज तेज़ गेंदबाज़ जेसन गिलेस्पी और पूर्व विकेटकीपर-बल्लेबाज़ एलेक स्टीवर्ट को कोच बनाने की वकालत की है। उनके पास अनुभव है, लेकिन कोई भी विकल्प असाधारण नहीं लगता।
जोनाथन ट्रॉट ने अफगानिस्तान के साथ अच्छा काम किया है, लेकिन लंबे टेस्ट चक्र की कठोर परीक्षा में वे अब भी अप्रमाणित हैं। इससे साफ़ है कि इस समय इंग्लैंड के पास विकल्प सीमित हैं।
मैकुलम से पहले इंग्लैंड की स्थिति:
मैकुलम के आने से पहले भी इंग्लैंड की हालत आदर्श नहीं थी। जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्रॉड जैसे महान तेज़ गेंदबाज़ों की मौजूदगी के बावजूद टीम दिशाहीन थी। आत्मविश्वास, स्पष्टता और साहस की कमी साफ़ झलकती थी। ऑस्ट्रेलिया में भले ही करारी हार मिली, लेकिन कुछ सत्रों में इंग्लैंड ने संघर्ष जरूर किया। बेज़बॉल पूरी तरह असफल नहीं रहा, लेकिन उसकी सीमाएँ अब गंभीर रूप से उजागर हो चुकी हैं।
तैयारी की कमी और वैचारिक ज़िद:
सबसे बड़ी कमजोरी मैदान के बाहर लिए गए फैसले रहे। विदेशी परिस्थितियों में बिना अभ्यास मैच खेले, वह भी अनुभवहीन गेंदबाज़ों और बल्लेबाज़ों के साथ उतरना चौंकाने वाला निर्णय था। तैयारी को विचारधारा की बलि चढ़ा दिया गया। बेज़बॉल का कुल रिकॉर्ड (८ जीत और ११ हार) सतही तौर पर ठीक दिखता है, लेकिन भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ इंग्लैंड ने पिछले ८ में से ७ टेस्ट गंवाए हैं। पाकिस्तान में भी हार झेलनी पड़ी।
प्रणालीगत खामियाँ:
साल २०१२ में भारत दौरे पर इंग्लैंड की सफलता का राज़ तीन अभ्यास मैच थे। योजनाबद्ध तैयारी और परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता ने टीम को जीत दिलाई थी। इस बार इंग्लैंड को लगा कि केवल मानसिकता ही तकनीकी कमियों को ढक सकती है, जो ऑस्ट्रेलिया में पूरी तरह विफल हो गई।
यह संकट सिर्फ मैकुलम का नहीं है। काउंटी क्रिकेट एकरूप हो चुका है, स्पिन गेंदबाज़ी की उपेक्षा हुई है, मार्क वुड जैसे चोट-प्रवण तेज़ गेंदबाज़ों का प्रबंधन कमजोर है और इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) के पास दीर्घकालिक रणनीति की स्पष्ट कमी दिखाई देती है।
आगे क्या?
ईसीबी चाहे तो मैकुलम को हटा सकता है, लेकिन क्या यह जोखिम उठाया जाना चाहिए? यदि उन्हें हटाया गया, तो इंग्लैंड एक बार फिर पुराने संकट में फँस सकता है। और यदि उन्हें बनाए रखा गया, तो रणनीति में बदलाव अनिवार्य होगा।
बेज़बॉल को नारेबाज़ी नहीं, संतुलन चाहिए—कम अहंकार, अधिक अनुशासन, कम दिखावा और बेहतर तैयारी। क्योंकि टेस्ट क्रिकेट नारों से नहीं, बल्कि पाँच दिनों की कौशल, धैर्य और योजना से जीता जाता है। जब तक इंग्लैंड इन बुनियादी सच्चाइयों को स्वीकार नहीं करता, तब तक मैकुलम हों या कोई और कोच, टीम को संकट से बाहर निकालना आसान नहीं होगा।









