खरसांग: बिमल गुरूंग अगर मुझसे यह पूछते हैं कि मैं खरसांग क्यों आया, तो क्या मैं यह कह सकता हूँ कि सांसद राजू बिष्ट मणिपुर से क्यों आए हैं? मैं इस तरह की बात नहीं करता। बाहरी-भीतरी की बात करने के बजाय राजनीति करने वालों को इतिहास अच्छी तरह पढ़ना चाहिए—ऐसा कहना है भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के उम्मीदवार अमर लामा का।
उन्होंने खरसांग विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत घुमटी चाय बागान में चुनाव प्रचार के दौरान पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि बाहरी-भीतरी का विभाजन नहीं होना चाहिए। बिमल गुरूंग खुद को दुनिया भर के गोरखाओं का नेता मानते हैं। लेकिन बोलने का मौका मिलते ही कुछ भी बोलना सही नहीं है। बोलने से पहले यह समझना जरूरी है कि अतीत में उन्होंने क्या किया है।
साल २०१२ के जीटीए चुनाव में बिमल गुरूंग खरसांग से प्रदीप प्रधान को लेकर दार्जिलिंग के पान्दाम क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उस समय हमने कुछ नहीं कहा। माइक मिलते ही मनमाने ढंग से बोलना नहीं चाहिए, जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि खरसांग–कालिम्पोंग, दार्जिलिंग–कालिम्पोंग, दार्जिलिंग–खरसांग—इस तरह बाहरी-भीतरी का कोई विभाजन नहीं होता। हम दार्जिलिंग और कालिम्पोंग को मिलाकर गोरखालैंड की मांग करते हैं, लेकिन इस तरह विभाजन की राजनीति नहीं करनी चाहिए।
बिमल गुरूंग के संदर्भ में बोलते हुए अमर लामा ने कहा कि उन्होंने मुझे खरसांग का बाहरी बताया, लेकिन मैंने तो यह नहीं कहा कि उनके साथ रहने वाले सांसद राजू बिष्ट मणिपुर से आए हैं क्योंकि मेरा विवेक इसकी अनुमति नहीं देता।
उन्होंने आगे कहा कि मनमोहन सिंह पंजाब के होने के बावजूद असम से सांसद बनकर प्रधानमंत्री बने थे। राजनीति करने वालों को इतिहास अच्छी तरह पढ़ना चाहिए। भारत में आने-जाने का अधिकार है, यह देश के संविधान ने दिया है।











