सुंदरबन: सुंदरबन के मछुआरे बेहद असहाय स्थिति में हैं। उनका जीवन और आजीविका हमेशा गहरे अनिश्चितता के बीच टिका रहता है। एक ओर खारे पानी के मगरमच्छ और दूसरी ओर ज़मीन के बाघ—इन दोनों के बीच संघर्ष कर जो लोग अपना पेट पालते हैं, उनके बड़े हिस्से को लंबे समय से यह शिकायत है कि उन्हें उचित सरकारी सहायता या मुआवज़ा नहीं मिल पाता।
‘निषिद्ध क्षेत्र’ और परमिट की समस्या मछुआरों के लिए सबसे बड़ी बाधा है। कोर एरिया या संरक्षित वन क्षेत्र में कई मछुआरे अधिक मछली या केकड़े की तलाश में प्रवेश कर जाते हैं। यदि इस क्षेत्र में कोई दुर्घटना होती है, तो वन विभाग के नियमों के अनुसार उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिलता। वर्तमान में अदालत के फैसले के अनुसार कोर और बफर क्षेत्र की सीमाओं को लेकर स्पष्ट बाधा नहीं है, फिर भी जिनके पास वैध बीएलसी (बोट लाइसेंस सर्टिफिकेट) नहीं है, उनके परिवार भी कई मामलों में सरकारी सहायता से वंचित रह जाते हैं।
सुंदरबन में मछली पकड़ने के लिए बोट लाइसेंस सर्टिफिकेट (बीएलसी) अनिवार्य है। फिलहाल इन लाइसेंसों की संख्या सीमित है और नए लाइसेंस जारी करना लगभग बंद कर दिया गया है। यह प्रक्रिया वन विभाग और दक्षिण २४ परगना जिला परिषद द्वारा नियंत्रित होती है। परिणामस्वरूप कई मछुआरे ऊंचे किराये पर दूसरों का लाइसेंस लेकर मछली पकड़ने जाते हैं। ऐसे मामलों में यदि दुर्घटना हो जाए तो कानूनी जटिलताओं के कारण मुआवज़ा अटक जाता है।
पश्चिम बंगाल सरकार के मत्स्य विभाग द्वारा दुर्घटना में मृत मछुआरों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता (जैसे ‘मछुआरा बंधु’ योजना) का प्रावधान है, लेकिन इसे पाने के लिए अनेक दस्तावेज़ और लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जागरूकता की कमी या दलालों के चक्कर में पड़कर गरीब मछुआरा परिवार अक्सर इस लाभ से वंचित रह जाते हैं।
वर्तमान में प्रभावितों की संख्या दो सौ से अधिक बताई जा रही है। हर वर्ष कई लोग जान गंवाते हैं या स्थायी रूप से अपंग हो जाते हैं, जिनका सही आंकड़ा कई बार दर्ज भी नहीं हो पाता। परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य को खोने के बाद कई परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। बाघों के हमलों से बचने के लिए अनेक लोग गांव छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जा रहे हैं। नदी किनारे के क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की कमी भी बड़ी समस्या है।
सुंदरबन के लोगों की लड़ाई केवल बाघों से ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और प्रशासनिक जटिलताओं से भी है। वन विभाग का कहना है कि अवैध रूप से जंगल में प्रवेश बंद किए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। वहीं मछुआरों का कहना है कि पेट की मजबूरी में जोखिम उठाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। कूलतली, गोसाबा और पाथर प्रतिमा की हालिया घटनाएं इसका जीवंत प्रमाण हैं।










