फिल्म बनाने का फ़ॉर्मूला दर्शकों के हिसाब से बदलता है: ब्रात्य बसु

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कोलकाता: सिनेमा की बॉक्स ऑफिस सफलता, हिंदी फिल्मों के साथ बंगाली फिल्मों की टक्कर और खुद बंगाली फिल्मों के आपसी मुकाबले, ये सारी बातें अब दर्शकों के ड्रॉइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं। हर शुक्रवार अलग-अलग स्वाद और अलग-अलग बजट की फिल्में रिलीज़ होती हैं। कुछ फिल्में सफल होती हैं, कुछ औंधे मुंह गिर जाती हैं, कुछ पहले दिन से ही बम्पर हिट हो जाती हैं, तो कुछ फिल्में धीरे-धीरे लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर बॉक्स ऑफिस पर मुनाफ़ा कमाती हैं। कई बार देखा जाता है कि किसी फिल्म की कहानी हिट हो जाती है, तो कभी फिल्म की जोड़ी या स्टारकास्ट दर्शकों के दिल को छू जाती है।
कुछ दिन पहले एक फिल्म के प्रचार के दौरान अभिनेता, निर्देशक, साहित्यकार, नाट्यकार और मंत्री ब्रात्य बसु ने कहा, “सिनेमा का फ़ॉर्मूला दर्शकों के हिसाब से बदलता रहता है। जब किसी फिल्म का विषय बॉक्स ऑफिस पर काम नहीं करता, तब चालाक दिमाग़ काम करता है, फिल्म में थोड़ा देशप्रेम, राष्ट्रवाद मिला दो और फिल्म हिट। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी फिल्मों की गूंज कितनी होती है? ये फिल्में बाद में दर्शकों के मन में कितने दिन तक रहती हैं? कई हिट फिल्में ऐसी होती हैं, जो ‘यूज़ एंड थ्रो’ जैसी होती हैं।”
उन्होंने आगे जोड़ा, “इस फ़ॉर्मूले में भी ऐसा होता है कि कोई एक तरह की फिल्म हिट हो जाए, तो उसी तरह की फिल्में बनने लगती हैं। फिर एक समय के बाद यह ट्रेंड भी बदल जाता है।”
वें उदाहरण देते हुए कहा, “१९७५ में एक शुक्रवार को ‘शोले’ रिलीज़ हुई थी। शनिवार को ही समझ में आ गया कि सिनेमाघरों में दर्शक नहीं आ रहे हैं। तब रमेश सिप्पी के घर पर सलीम-जावेद बैठकर चर्चा कर रहे थे कि शायद फिल्म का अंत दर्शकों को पसंद नहीं आया, विधवा से शादी वाला विषय लोगों को नहीं भाया। उन्होंने तय किया कि फिल्म को फिर से शूट कर दोबारा रिलीज़ किया जाएगा। सब तय हो जाने के बाद उन्होंने सोचा, एक दिन और देखते हैं। इसके बाद जो हुआ, वह तो इतिहास बन चुका है।”

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