कोलकाता: राज्य में उच्च अधिकारियों के तबादले को लेकर दायर पीआईएल की सुनवाई तीन दिनों तक चली और शुक्रवार को यह समाप्त हो गई। चीफ जस्टिस सुजय पाल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की डिविजन बेंच ने अपने फैसले को रिजर्व कर लिया।
इस पीआईएल में निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए तबादलों को मनमाना और तानाशाही बताया गया है। निर्वाचन आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और कोलकाता के सीपी समेत कई आला अफसरों का तबादला किया है।
एडवोकेट अनामिका पांडे ने बताया कि सोमवार को चुनाव के समय अन्य राज्यों में किए गए अफसरों के तबादलों की सूची चीफ जस्टिस के बेंच के समक्ष पेश की जाएगी।
पेटीशनर की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने कहा कि इस तरह के तबादलों से सरकार कैसे चलेगी और कल्याणकारी योजनाओं पर अमल कैसे होगा, खासकर जब सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही तबादले हुए हैं।
राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल किशोर दत्त ने तर्क दिया कि कानून के अनुसार, राज्य सरकार जब तक चुनावी कार्य के लिए अफसरों को नामित नहीं करती, तब तक वे निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में नहीं आते। मुख्य सचिव के तबादले का निर्णय केवल मुख्यमंत्री ले सकते हैं।
निर्वाचन आयोग की तरफ से सीनियर एडवोकेट एस.डी. नायडू ने कहा कि चुनाव के दौरान किसी भी अफसर के तबादले में आयोग किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है और इसके किसी भी आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने पीआईएल को खारिज करने का अनुरोध किया।










