नवद्वीप में गौड़ीय मठ में डोलयात्रा एवं श्रीचैतन्य का आविर्भाव महोत्सव

IMG-20260303-WA0004

बेबी चक्रवर्ती

फाल्गुन के अंतिम प्रहर में जब बंगाल का आकाश रंगों के उल्लास से भर उठा, तब गंगातटवर्ती नवद्वीप एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण में जाग उठा। अवसर था गौड़ीय मठ में आयोजित डोलयात्रा और श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव महोत्सव का।
सन् १४८६ में इसी फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को नवद्वीप में श्रीचैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव हुआ था। उनके जन्म के समय चंद्रग्रहण लगा हुआ था और गंगा घाटों पर असंख्य लोग हरिनाम संकीर्तन में लीन थे। उसी नामध्वनि के बीच उनका प्राकट्य हुआ, जो आगे चलकर उनके जीवन-दर्शन का केंद्रबिंदु बना।


डोलयात्रा के अवसर पर एक दिन पहले से ही मंगलआरती आरंभ हो जाती है। शंखध्वनि, घंटानाद और कीर्तन की मधुर ध्वनियों से मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठता है। फूलों, आकर्षक रोशनी और वैष्णव पताकाओं से संपूर्ण आश्रम को सजाया जाता है। भक्तगण सफेद या गेरुए वस्त्र धारण कर, माथे पर तिलक लगाकर और हाथों में माला लेकर नामजप में भाग लेते हैं।
केवल नदिया जिला ही नहीं, बल्कि राज्य के विभिन्न हिस्सों तथा देश-विदेश से भी अनेक श्रद्धालु इस उत्सव में सम्मिलित होते हैं।
इस अवसर पर पांच दिन पूर्व से ही धाम परिक्रमा प्रारंभ हो जाती है। महा संकीर्तन के साथ साधु-संत और भक्त नगर परिक्रमा में भाग लेते हैं। कीर्तन की स्वर लहरियों, पताकाओं और पुष्पमालाओं से सुसज्जित यह शोभायात्रा नवद्वीप की गलियों से होकर आगे बढ़ती है।
गौड़ीय मिशन के आचार्य एवं अध्यक्ष भक्ति सुंदर संन्यासी महाराज ने कहा कि आज से ५४० वर्ष पूर्व चंद्रग्रहण के दिन ही महाप्रभु का आविर्भाव हुआ था। इस वर्ष भी उसी उपलक्ष्य में ५४० दीप प्रज्वलित करने तथा विशेष प्रार्थना का आयोजन किया गया है। लाल-सफेद वस्त्रों में सुसज्जित महिलाएं शंखध्वनि और उलुध्वनि से वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। “हरिबोल” के जयघोष से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है।


उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व में जब विभाजन, हिंसा और असहिष्णुता बढ़ रही है, तब श्रीचैतन्य का प्रेम और एकता का संदेश विशेष महत्व रखता है।

About Author

Advertisement