तुलसी घिमिरे का ‘पहाड़’: नेपालीपन और अभिनय का संगम​

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काठमांडू(नेत्र विक्रम बिमली): नेपाली फिल्म जगत के दिग्गज निर्देशक तुलसी घिमिरे इन दिनों अपनी नई फिल्म ‘पहाड़’ के जरिए एक बार फिर दर्शकों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। ‘चिनो’, ‘कुसुमे रुमाल’ और ‘दर्पण छायाँ’ जैसी व्यावसायिक और कलात्मक रूप से सफल फिल्में देने वाले घिमिरे ने इस बार ‘पहाड़’ में नेपाली समाज के गहरे और मर्मस्पर्शी पहलुओं को समेटा है। लगभग पांच दशकों से नेपाली कला और भाषा की श्रीवृद्धि में उनके विशिष्ट योगदान के सम्मान स्वरूप नेपाल सरकार से हाल ही में ‘मानद नागरिकता’ (सम्मानित नागरिकता) प्राप्त करने जा रहे घिमिरे का इस फिल्म के प्रति आत्मविश्वास इसके स्तर और महत्व को और अधिक पुष्ट करता है।​आमतौर पर नेपाली फिल्मों को केवल मनोरंजन के साधन के रूप में देखा जाता है, लेकिन घिमिरे ने इस बार उस दायरे को तोड़ने का प्रयास किया है। ‘पहाड़’ केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि दर्शकों के लिए अपने जीवन के अनुभवों और छिपे हुए दर्द को महसूस करने वाले एक जीवंत आईने के रूप में तैयार की गई है। विशेष रूप से नेपाली समाज लंबे समय से जिस ‘पलायन’ के कड़वे सच और उससे उपजी पीड़ा को झेल रहा है, उसे ही इस फिल्म की मुख्य विषयवस्तु बनाया गया है। निर्देशक घिमिरे ने इस बार भी नेपाली मिट्टी की सोंधी खुशबू और पहाड़ी जनजीवन की संवेदनशीलता को पर्दे पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।​फिल्म का एक और सशक्त पक्ष इसकी कास्टिंग और कलाकारों की भूमिका है।

नेपाली कला जगत के दो अलग-अलग धाराओं के दिग्गज हस्तियों- मदनकृष्ण श्रेष्ठ और सुनील थापा को इस बार दर्शक बेहद अनोखे और अप्रत्याशित चरित्रों में देख सकेंगे। उनकी इस अलग उपस्थिति ने फिल्म के प्रति उत्सुकता को और बढ़ा दिया है। इसी तरह, हर फिल्म में खुद को नए सांचे में ढालने में माहिर अभिनेता विपिन कार्की इस बार भी बिल्कुल अलग भूमिका में नजर आने वाले हैं। एक संदेशमूलक कहानी की नींव पर खड़ी ‘पहाड़’ दर्शकों को न केवल सिनेमा हॉल तक लाने, बल्कि उन्हें एक अर्थपूर्ण संतुष्टि देकर वापस भेजने का दावा करती है। इस बार दर्शकों से आलोचना के बजाय तालियाँ ज्यादा मिलने की उम्मीद में निर्देशक घिमिरे और उनकी टीम पूरी तरह आश्वस्त दिखाई दे रही है।

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